सोशल मीडिया जरूरत या दिखावा

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हम सब लोग अपनी जिंदगी जीते हैं और उसमें कभी हारते हैं तो कभी जीतते हैं। दोनों ही भावनाएं बहुत अहम होती है। यही हमारा व्यक्तित्व निर्धारित करता है पर आज हमारे युवा इन भावनाओं से दूर होते जा रहे हैं। जीतते हैं तो फेसबुक और व्हाट्सएप पर स्टेटस पोस्ट करते हैं और हारते भी हैं तो, यहां तक तो सही है लेकिन आज कल किसी को खोते भी हैं तो वह फेसबुक या व्हाट्सएप का स्टेट्स बन जाता है।

लोगों की जिंदगी में इतना अकेलापन है कि लोग सहानुभूति पाने के लिए किसी भी मौके को नही छोड़ना चाहते।

सोशल मीडिया में काफी ट्रेंड बना हुआ है। कोई भी अपना मरता है तो उसके साथ सेल्फी लेते है और उसे फेसबुक या व्हाट्सएप पर अपडेट करना नही भूलते या पोस्ट डालते है।

उसके बाद लोगों को सहानुभूति मिलना तो शुरू हो जाती है. लेकिन हम कितने उदासीन हो चुके है कि अपनी भावनाओं के प्रति दुख और खुशी के पलों को महसूस करना बंद कर चुके है। सिर्फ कुछ लोगों का ध्यान खींचने के लिए ऐसा स्टेटस डालते है।

क्या वाकई अकेलापन इस समाज के युवाओं पर इस कदर हावी है कि वह खुशी और गम को जीना छोड़कर लोगो को ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करने में लगा हैं।

इतिहास गवाह है कि दुनिया मे जो भी बदलाव आया है वह इमोशन की ही देन है। जब किसी को कुछ अच्छा नही लगा तो वह बदलने की कोशिश की। ऐसे ही धीरे-धीरे दुनिया मे बदलाव आया। अगर हम अपनी भावनाओं से काट जाएंगे और उसे महसूस करना बंद कर देंगे तो यह दुनिया उदासीन हो जाएगी।

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