07, Dec, 2016
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नोटबंदी पर एक बिहारी निर्देशक के मन की बात !

2000-note

इस लेख के लेखक विकास झा फिल्म निर्देशक हैं। मैथिली-भोजपुरी और कई एड फिल्मों का निर्देशन कर चुके विकास वर्तमान में मुंबई में रहते हैं। विकास का फेसबुक आईडी है http://facebook.com/vixy.pro

सच पूछिए तो मैं नोटबंदी के इस ऐतिहासिक फैसले से सिर्फ इतना ही उम्मीद कर रहा हूँ की देश में सिर्फ नमक-पानी पर टैक्स और आधुनिक सिनेमाघरों में दस गुने से ज्यादा दाम पर बेचे जाने वाले पॉपकॉर्न की कीमत ही वाजिब हो जाए तो मैं इस अभियान को सफल मानते हुए गंगा स्नान कर लूँ।
नोट : गंगा स्नान करने का स्थान सिमरिया घाट बरौनी बिहार ही होगा। बनारस, संगम, हरिद्वार, ऋषिकेश या गंगोत्री नहीं। इनकम टैक्स, सर्विस टैक्स, वैल्यू एडेड टैक्स, सेल्स टैक्स, रोड टैक्स, टोल टैक्स, मेंटिनेंस टैक्स, डेवलपमेंट टैक्स, एंटरटेनमेंट टैक्स, अर्जित संपत्ति पर सालाना टैक्स, हर छोटी खरीद बिक्री पर टैक्स, स्वच्छ भारत अभियान टैक्स और लोकल टैक्स एक्स्ट्रा ..
अब कोई ये मत सोच ले की “स्वच्छ भारत अभियान टैक्स” के अलावा ये सारे टैक्स वर्तमान सरकार ने ही लगवाये हैं और ना ही मैं ऐसा कह रहा हूँ..

हाँ मैं ये जरुर कहना चाह रहा हूँ की इतने सारे टैक्स तो शायद ब्रिटिश राज में भी नहीं लगाए गए थे..
तथाकथित राजनैतिक स्वतंत्रता के बाद भारत निर्माण, भारत विकास और आत्मनिर्भर राष्ट्र होने के नाम पर कुछ वाजिब टैक्स लगाए गए आम नागरिकों पर और लोगो ने सब टैक्स को सहर्ष स्वीकार किया।
कुछ लोग टैक्स चुकाते गए..कुछ लोग टैक्स चुराते गए..
टैक्स चुकाने से पब्लिक सेक्टर यूनिट्स के उद्योगों का प्रादुर्भाव और भारत का हर संभव विकास हुआ
टैक्स चुराने से भ्रष्टाचार वृद्धि और काले धन का भंडार जमा होता चला गया.
आज के वर्तमान आर्थिक युग में काले धन, नकली नोट, भ्रष्टाचार, कॉर्पोरेट स्कैंडल्स, अंडरवर्ल्ड अपराध जगत और सीमा पार पकिस्तान समर्थित आतंकवाद सम्बन्धित समस्याओं का एक आकस्मिक समाधान “विमुद्रिकरण” के रूप में लागु किया गया.
इसे भी “टैक्स चुकाने वाले” लोगो ने हर संभव रोते हुए या हँसते हुए स्वीकार किया है।
परिणामस्वरूप देश की आधे से ज्यादा आबादी आज सडको पे लाइन में खड़े हैं।
कुछ लोगों को जान से हाथ धोना पड़ गया है लेकिन वो शहीद नहीं कहे जायंगे क्यूंकि शहीद होने का हक सिर्फ और सिर्फ सेना को ही है।
लोगो के लाइन में खड़े होने वाली दिक्कत को लेकर कुछ लोगो का यह कहना है की सेना सीमा पर लाइन में खड़े होकर गोलियां खाते है तो आम लोग क्यूं नहीं लाइन में खड़े हो सकते हैं..सही बात है..लेकिन सेना के जवान को शहीदी भी तो मिलती है लेकिन यहाँ बैंक/हॉस्पिटल/ एटीएम के सामने लाइन में लग कर जान देने वाले लोग तो गधे ही हैं..उन्हें ना कभी किसी टैक्स में छूट मिली ना कभी विशेष सुविधा मिली जो सेना को मिलता आ रहा है..क्यूंकि वो तो “ब्लडी सिविलियन” हैं…

खैर आगे बढ़ते हैं..
“विमुद्रिकरण” के कारण समस्या, अव्यवस्था, और असुविधा के बदले सरकार ने देश को यह विश्वास दिलाने का पूरजोर “भावुक प्रयास” किया है की कुछ दिनों/महीनो बाद संभावनाओं से परे (बियॉन्ड पोसिबिलीटीज़) बैंक के व्याज की दर में भारी गिरावट आएगी, टैक्स में छूट मिलेगी, काला धन बाहर आ जायेगा या जहाँ है वही के वही नष्ट हो जायेगा, महंगाई कम हो जाएगी, भारत फिर सोने की चिड़िया बन जाएगी, सीमा पार पाक समर्थित आतंकवाद पर लगाम लग जायेगा, टैक्स चुराने वाले बर्बाद हो जायेंगे वगैरह वगैरह…
ऐसा नहीं है की 1947 के बाद से लेकर 2013 तक अधिकांशतः कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकारों में भारत सिर्फ और सिर्फ बर्बाद ही हुआ है..हाँ ये कहें की विकास जितना और जिस स्तर पर होना चाइये वो ना होकर घटिया स्तर की राजनीति ज्यादा हुई..लेकिन देश विकास के रास्ते दो चार कदम ही सही पर चला तो जरुर है।
अब कांग्रेस विपक्ष में है. वर्तमान स्पष्ट बहुमत वाली सरकार को विमुद्रीकरण का इतना बड़ा फैसला अकेले हि नहीं लेना चाहिए था..पूरा देश शामिल है इसके प्रभाव में…
पक्ष विपक्ष मेजोरिटी माइनॉरिटी सभी सूत्रों को एक धागे में पिरो के एक मंच पर लाकर आपसी सामंजस्य और पूरे राष्ट्र की सहमती से ही इतना बड़ा फैसला लिया जाना चाहिए था.
देश के चार पाँच महानगरों को पूरा देश मानकर यह सोच लिया गया की सभी लोग बैंक में अपना पैसा जमा करवाएंगे और नए नोट प्राप्त करेंगे.
पर ग्रामीण क्षेत्र और सुदूर देहातों का क्या जहाँ “कमजोर भारत का वास्तविक अस्तित्व” छिपा बैठा है. कितने लोग को वहाँ “पेटीऍम” की जानकारी है.
ऐसा नहीं है ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षित लोग नहीं है लेकिन आज के संदर्भ में शिक्षा का मतलब महज लिखने पढने के ज्ञान से ही नहीं है.
मेरे पिताजी बहुत पढ़े लिखे है लेकिन वो इन्टरनेट सेवाओं का उपयोग करने में स्वयं को सहज मसूस नहीं करते या करना ही नहीं चाहते हैं..मेरी माँ भी पढ़ी लिखी गृहणी है लेकिन स्मार्ट फ़ोन के तंत्र मन्त्र से उसका कोई सरोकार नहीं है।
अब ऐसी परिस्थिति में कितने लोग ऑनलाइन पेमेंट के विकल्प पर खुश हो जायंगे की हाँ सच में भारत बदल रहा है.
भारत को सच में बदलना ही है तो ग्रामीण और देहात के इलाकों को हर मामले समृद्ध करना ही होगा.
फिलहाल तो बैंक की पहुँच देश के कोने कोने में हो जाए तो इस आफत से कुछ आफियत मिले और बैंकों में नए नोटों वाली नकद राशी की आपूर्ति हो जाए तो संभवतः निर्धारित 50 (इस अभिव्यक्ति को लिखे जाने तक 50 में से सात दिन बीत चुके हैं) दिन का अभियान सुविधाजनक रूप से सम्पन्न हो
हाँ सफलता की कोई गारंटी नहीं है।
इस आक्रामक निर्णय के परिणाम स्वरुप मैं अगर ये उम्मीद कर लूँ की अब “पाक ओक्युपाइड कश्मीर” और “अक्साई चीन” भारत में शामिल हो जाए, कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों में भी भारतीय संविधान की वहीँ धाराएं लागू हों जो सामान्य रूप से पूरे देश में मान्य है, ऊपर कहे गए तमाम टैक्स के बदले कोई एक टैक्स सामान्य और सर्वमान्य रूप से लागू हो जाए, नेताओं और अफसरों के बच्चे भी सरकारी स्कूलों में पढने लग जाए, सरकारी अस्पतालों की ब्यवस्था निजी अस्पतालों के मुकाबले बेहतर हो जाए, सभी बंद पड़े कल कारखाने इसी विमुद्रीकरण के आकस्मिक फैसले की तरह आकस्मिक रूप से चालु कर देने के आदेश दिए जाए, किसानो का आत्महत्या करना बंद हो जाए, भारत को संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता मिल जाए, भारतीय सिनेमा को ऑस्कर मिल जाए, ओलिंपिक खेलों में महिलाओं के अलावा पुरुषों को भी कोई मेडल मिले वगैरह वगैरह तो मैं निश्चित रूप से बेवक़ूफ़ हि कहा जाऊंगा

और हाँ..अगर “एक डॉलर के बराबर एक भारतीय रुपया” हो जाने की उम्मीद कर लूँ तब तो समझ लीजिये अव्वल दर्जे का देश द्रोही और पागल की श्रेणी में मेरा नाम सबसे उपर होगा।

(नोट: ये लेखक के मौलिक विचार हैं)

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2 विचार साझा हुआ “नोटबंदी पर एक बिहारी निर्देशक के मन की बात !” पर

  1. DILIP November 24, 2016

    BAKWASH BHRAMIT BAMPANTHI … DANGAI SOCH WALA … LEKH NA LIKHO….ADMIN…

    • Prasoon Pankaj November 24, 2016

      प्रिय दिलीप जी, आपको पूर्ण स्वतंत्रता है किसी के विचार और विचारधारा को नापसंद करने के लिए लेकिन एक मीडियाकर्मी होने के नाते हमें ये स्वतंत्रता हासिल नहीं है। हम समाज के हर नजरिए को सम्मान देंगे और बशर्ते उसकी भाषा सभ्य और मर्यादित हो। नोटबंदी जैसे अहम मुद्दे पर हम जनता की राय मांग रहे हैं और अगर आप भी चाहें तो अपनी राय हमें भेज सकते हैं। info@newsofbihar.com पर आप अपना विचार हमें भेजे। दक्षिणपंथ और वामपंथ दोनों ही विचारधारा का हम सम्मान करते हैं।

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