जूड़ शीतल से जुड़ी वो परंपराएं और कहानियां जिन्हें आप अपनी अगली पीढ़ी को भी जरूर बताएं

जूड़ शीतल मिथिला का महापर्व
जूड़ शीतल मिथिला का महापर्व
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जूड़ शीतल यानि मिथिला का एक ऐसा पर्व जिसमें प्रकृति से जुड़ते हुए और पूर्ण प्राकृतिक सामग्रियों का इस्तेमाल किया जाता है। इस पर्व की मिथिला में बहुत विशेषता है। मान्यताओं के मुताबिक इस दिन घर की बुजुर्ग महिलाएं अपने से छोटों के सिर पर जल देती हैं और शीतलता यानि जुड़ायल रहने का आशीर्वाद देती हैं। इस दिन महिलाएं पुरुष बच्चे सभी मिलकर जल के विभिन्न स्त्रोत की साफ-सफाई भी करते हैं। इस दिन पेड़ पौधों की जड़ों में भी जल देने की मान्यता है। कुल मिलाकर ये महापर्व संदेश देता है कि प्रकृति के प्रति भी हम इंसानों को कृतज्ञ होना चाहिए।

जूड़ शीतल के दिन सत्तू, आम के टिकोले की चटनी, बड़ी-भात, दही इत्यादि व्यंजन विशेष रूप से खाने की परंपरा है। हां एक और अहम बात की इस दिन तिब्बत के खिलाफ जंद जीतने वाले मिथिला के राजा शैलेष की भी जयंती है। राजा शैलेष की राजधानी महिसौछ-सिराहा (वर्तमान समय में नेपाल) में थी। अनेको बार उन्होंने मिथिला क्षेत्र को तिब्बती आक्रमणकारियों से बचाया था इसके बाद ही उनको शैलेष यानि हिमालय के राजा की उपाधि दी गई। स्थानीय लोग इनको बोलचाल की भाषा राजा सलहेश के नाम से भी जानते हैं। नेपाल के सिरहा बगीचा में राजा शैलेष का गहवर आज भी दर्शनीय है।

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जूड़ शीतल की परंपरा के बारे में रंजना मिश्रा लिखती हैं कि हमेशा की तरह 14 अप्रैल को सत्तू और बेसन के व्यंजनों के साथ मिथिला के लोग जुड़ शीतल मानते है । जो ,बिहार में सत्तूआइन ,बंगाल में नया साल ,पंजाब में वैशाखी ,असम में शायद बिहू और केरल में विशु कहलाता है। सम्भवत एक ऐसा पर्व जो देश के अलग अलग हिस्सों में अलग अलग नाम से मनाया जाता है। नाम चाहे जो हो वजह एक ,रबी की फसल काटे जाने का उत्साह। भारत एक कृषिप्रधान देश है इसलिए सभी पर्व भी उस समय होने वाले फसलों पर आधारित होते हैं। स्कूल के समय कौन सी फसल किस समय होती है इसे याद करना हम शहर में रहने वालों बच्चों के लिए बेहद कठिन होता था।

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लेकिन बाद में ये बात समझ में आ गई कि 13जनवरी को दही चूड़ा खाने की परंपरा इसलिए है कि उस समय नए धान की उपज होती है इसी प्रकार 14 अप्रैल को गेहूँ और दलहन के पैदावार का समय है तो हमारे पूर्वजो ने इस समय बेसन ,सत्तू और दालपुरी खाने की प्रथा बनाई। इतने स्पष्ट करने पर भी हम रटने वाली विद्या को मानते हुए रबी और खरीफ को काटे जाने वाले समय को रटते जा रहे है तो किसी का क्या दोष ? एक बात और भले ही आज लिट्टी चोखा के कारण सत्तू को सब जानने लगे हैं लेकिन सत्तू आज से 25 -30 साल पहले से ही बिहार से बाहर जाने वाले हर विद्यार्थी के बैग में एक अहम् भूमिका निभाता आ रहा है ।” बिहारी हॉर्लिक्स” के नाम से प्रसिद्ध सत्तू, दिल्ली में पढ़ने वाले मेरे भइया का साथ ठीक उसी प्रकार निभाता था जैसे बैंगलोर में पढ़ने वाली दीदी की बेटी का हो या आज मुम्बई में पढ़ने वाली मेरी बेटी का। इस सत्तू नाम की छोटी सी चीज़ को देखकर कभी एक दिन बंगलोर के क्राइस्ट हॉस्टल में मेरी बेटी( दीदी की बेटी ) के सामने केरल की एक लड़की उसे चखने के लालच से खुद को रोक नहीं पाई। क्या ऐसा नहीं लगता कि इस सत्तू ने उत्तर दक्षिण या देश विदेश की सीमा लांघ डाली !
(साभार: रंजना मिश्रा)

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