पितृदोष निवारण का सबसे सटीक उपाय बता रहे हैं ज्योतिषाचार्य पं बंशीधर झा ‘राणा’

Pitrados
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जन्मपत्री (कुण्डली) में मौजुद कई घातक दोषों में तीन मुख्य दोष परिलक्षित होता है:-
1. दैविक दोष।
2. ॠषि दोष।
3. पितृ दोष।

1.दैविक दोष:-यह लगने का मुख्य कारण कुल देवी-देवता के पूजन व अवहेलना होने से और मन्नत या मनौति पूर्ण नहीं होने से लगता है। दैविक दोष के कारण जातक का स्वास्थ्य हर मांगलिक कार्य, परीक्षा एवं पर्व त्यौहार के समय कमजोर हो जाता है।

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2.ॠषि दोष:-इस दोष से प्रभावित जातक को सन्तानोत्पत्ति में परेशानी होता है साथ ही उच्चपदस्थ व अच्छे लोगों से लंबे समय तक सम्बन्ध अच्छा नहीं रहता है।

3. पितृदोष:- यह दोष लगने का मुख्य कारण परिवार में किसी का असमायिक मृत्यु होता है। मृत व्यक्ति का मौत से पूर्व का जीवन जीतना ही अधिक कष्टकर होता है उतना ही अधिक संघर्षमय, कष्टकर व रोगकारक जीवन “पितृदोष” लगे व्यक्ति का हो जाता है। यह दोष जातक के लग्न में परिलक्षित होने से जातक को अधिक शारीरिक कष्ट, सिरोवेदना, अनायास गुस्सा अधिक आना व वाणी अधिक अनायन्त्रित होने लगता है। इसी प्रकार धन भाव में लगने से आर्थिक परेशानी, नेत्र में तकलिफ और रिश्तेदारों से आर्थिक क्षति पहूँचने का योग बनता है। तृतीय भाव में दृष्टिगत होने से मित्र व सगे-संबंधी से परेशानी होता है। चतुर्थ भाव प्रभावित होने से पारिवारिक परेशानी, जमीन-जायदि व मातृपक्ष पक्ष से कष्टकारक जीवन होने का योग बनता है। पंचम स्थान प्रभावित होने से अध्ययन में अनावश्यक कारणों से रुकावट व सन्तान पक्ष से कष्ट होने का योग बनता है। छठे भाव में दृष्टिगत होने से रोग व उलझन-विवाद से परेशानी का योग बनता है। सप्तम भाव यह योग लगने से दामपत्य जीवन कष्टकर, व्यापार वाधा व विश्वासघात के कारण परेशानी का योग बनता है। अष्टम भाव में योग लगने से जातक अधिक चिन्तनशील स्वभाव व शारीरिक परेशानी दायक जीवन हो जाता है। भाग्य स्थान में यह योग परिलक्षित होने से हर कार्य में वाधा व भाग्योदय में रुकावटें आने लगता है। दशम स्थान में लगने से कार्यक्षेत्र को लेकर परेशानी, व्यवासाय व नौकरी में कठनाई होता है साथ ही उच्चपदस्थ लोगों से प्रतारित होने का योग बन जाता है। एकादश भाव में योग लगने से आय का श्रोत बाधित और बुजुर्गों के कारण अधिक परेशानी का योग बनता है। व्यय भाव में दृष्टिगत होने से जीवन अधिक संघर्षशील हो जाता है।

पितृदोष लगने की संभावना जिन ग्रहों के द्वारा दृषष्टिगत होता है उस ग्रह के प्रकृति के सदृश्य उन जातकों को कष्ट पहूँचता है जैसे- मंगल के कारण दृष्टिगत होने से गुस्सा अधिक आना, रक्त व नस जनित समस्या होना साथ ही दामपत्य जीवन प्रभावित होने लगता है। इसी प्रकार दृष्टिगत सातों ग्रह के प्रकृति के अनुसार जातक के जीवन को प्रभावित करता है।

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इस दोष का सर्वप्रथम आकलन कुण्डली के माध्यम से करने का श्रेय मेरे गुरुवर ” डाँ उपेन्द्र झा” गढवासी टोला वाराणसी, उत्तर प्रदेश को जाता है जिन्होंने अपने दिव्य चक्षु व तीक्ष्ण बुद्धि के बल पर दोष को सहजता से कुण्डली के माध्यम से ज्ञात करने तथा सहजता, सुलभता और सटिकता से इस दोष के पूर्ण व स्थायी निवारण हेतु उपाय बतलाये है। इस दोष के शान्ति हेतु त्रिपीण्डी श्राद्ध(वाराणसी) में पिशाचमोचन कुण्ड पर करने का निर्देश देते है। जब कभी भी आप पूजन कराने जायेंगे उस कुण्ड पर भारतवर्ष के कई स्थानों के लोग यह पूजन को कराते नजर आयेंगे। यह पूजन कराने के उपरान्त कई लोगों के जीवन में बहुत ही अधिक परिवर्तन हुआ है।

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यह दोष जीवन के लिए बहुत ही अधिक कष्टकर होता है। किसी अच्छे कुण्डली के जानकार से कुण्डली(जन्मपत्री) का निरिक्षण कराकर इस दोष का निवारण करके अपने जीवन को आप भी व्यवस्थित कर सकते हैं। यह मुझे पूर्ण विश्वास है। लाभ नहीं होने पर आप मुझे बेझिझक फोन कर सकते है।

ज्योतिषाचार्य पं. बंशीधर झा ” राणा”
शिक्षक उच्च वि. ते. कटिहार, बिहार
मो. 9717535772

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