10, Dec, 2016
ब्रेकिंग न्यूज़

NEWS OF BIHAR

चुगला के बहाने, चलो सामा-चकेवा को बचाने: सामा-चकेवा विशेष

happy-sama-chakeva1

निखिल कुमार कि प्रस्तुति

पटना, 08 नवम्बर। बदलते वक्त के साथ बिहार भी बदला। गाँवों से शहरों की तरफ लोगों का रुझान हुआ। बिहार के लोग शहरों की चकाचौंध और आलिशान कोठियों और शीशे के मॉल को पटना के अलावा कहीं और नहीं देख पाए। लेकिन वक़्त की जरूरतों ने उन्हें छोटे-छोटे शहरों और कस्बों में ठसम-ठस भर दिया। रोड के ऊपर ढाले गए और पिचिंग की गई सड़कों पर वाहनों के बढ़ते दवाब ने बिहारियों के दिमाग पर भारी दवाब बना दिया। दवाब इतना ज्यादा था की सुबह से शाम तक शराब में डूब गया बिहार। फिर आया शराबबंदी का दौर। होली के बाद शराब बंद हो गया और बिहारियों की खुमारी दूर हुई। फिर तो जैसे रौनक लौट आया बिहार में।
अब असली मसले पर आते हैं। इतनी बातें हो क्यूँ रही हैं? त्यौहारों का मौसम चल रहा है और सबकुछ बदला-बदला नजर आ रहा है। दरभंगा से लेकर पटना तक और गया से लेकर भोजपुर तक निराशा के इस दौर में, एक आशा की किरण को देखा है बिहार ने वर्षों बाद। बिहार को आत्मनिर्भर और जागरूक होता देख अच्छा महसूस हो रहा है। दुर्गापूजा से शुरू हुआ त्यौहारों का मौसम सामा-चकेवा तक आ पहुंचा है। अलग अलग पर्व और त्यौहार। हिन्दूओं के भी और मुसलमानों के भी, बदल से गए हैं इस बार। कला और संस्कृति की तरफ इतना जागरूक बिहार पहली बार देख रहा हूँ। माँ दुर्गा के पंडालों में भक्ति लौट आई तो रमजान पर जैसे अल्ल्लाह मेहरबान हो गए।
अँधेरी गलियों की तरफ तेज स्पीड में बाइक भगाते युवाओं पर शराबबंदी का ब्रेक। शराबबंदी ने उनको अवसर दिया आत्मनिर्भर होने का। कुछ तो बिखर गए ताश के पत्तों की तरह। बहुतों ने आत्मविश्वास का दामन थाम लिया। कल तक दुर्गापूजा में सड़कों पर तेज रफ़्तार बाइकों से सांप-सीढ़ी खेलते युवाओं का माँ दुर्गा के सामने सिर झुकाना रास आ रहा है बिहार को। दुर्गापूजा और दिवाली तो राष्ट्रीय त्यौहार हैं। असल बदलाव तो छठ में नजर आया जब छठ ने राष्ट्रीय स्तर पर महापर्व बनने का गौरव पाया। हमारे संस्कार और संस्कृति से जुड़े इस पर्व के प्रति राष्ट्रीय स्तर पर लोगों का जागरूक होना सकारात्मक सन्देश है। शारदा सिन्हा से लेकर नितिन नीरा चंद्रा ने कला के माध्यम से विलुप्त होते इस महापर्व की तरफ लोगों का ध्यानाकर्षण किया। वहीं राज्य सरकार ने भी बिहार पर्यटन में इसको शामिल कर कला और संस्कृति के संरक्षण की तरफ अपना पहला कदम बढाया।
छठ को बचाने की पहल तो हुई लेकिन मिथिला के लोकसंस्कृति से जुड़ा लोकपर्व सामा-चकेवा धीरे-धीरे विलुप्त सा हो गया है। यह अचानक से नहीं हुआ है। मुझे आज भी याद है मेरी बहनों के मधुर आवाज़ में, मेरे कानों में शहद घोलते सामा-चकेवा के गीत। छठ के प्रति लोगों के आकर्षण ने छठ के विलुप्त होने की सम्भावना पर तो विराम लगा दिया है, लेकिन सामा-चकेवा अब दरभंगा मधुबनी के कस्बाई इलाकों से बेदखल होने के बाद, सुदूर देहात के सुनसान खेत में जाकर बस गया है। अब खेतों में विश्राम कर रहे कीड़े-मकौड़े से निकलने वाले आवाज के साथ मिलकर सामा-चकेवा के गीत वहीँ दम तोड़ रहे हैं। सामा-चकेवा भैयादूज से ज्यादा महत्वपूर्ण और रोचक होने के बाद भी अपना आकर्षण खोता जा रहा है।
अखबार के पन्नों और टी वी के स्क्रीन ने इस लोकपर्व को अभीतक वो स्थान नहीं दिया है जो इसको मिलना चाहिए। पौराणिक मान्यताओं पर आधारित इस लोकपर्व का समाप्त होना हमारी संस्कृति के आधुनिकता के सामने घुटने टेकने के बराबर है। बहन को उसका शरीर वापस दिलाने के लिए अपना शरीर त्यागने वाले एक भाई की कहानी से आज के युवा प्रेरणा ले सकते हैं। हमारे आधुनिक समाज के पात्रों से अलग कहाँ हैं सामा-चकेवा के पात्र। वही नारी है सामा जैसी, वही पुरुष है चकेवा जैसा। और वही शैतान हैं चुगला की तरह। अब भी वक़्त है समय रहते हम अपने बच्चों को अपने लोकपर्वों प्रति जागरूक करें। वरना न सामा रहेगी और न चकेवा। बस चुगले रहेंगे क्यूंकि बुराई को बचाने की आवश्यकता नहीं होती ,वह तो खुद फ़ैल जाता है।

newsofbihar.com की ख़बरें अपने न्यूज़फीड में पढ़ने के लिए पेज like करें

newsofbihar

अपने विचार साझा करें

आवश्यक लिखें चिह्नित:*

Powered By Indic IME