28 अप्रैल, 2017
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विजय दिवस…अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों

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पटना, 26 जुलाई। विजय दिवस अर्थात कारिगल पर फतह करने वाला दिन। वह दिन जिसे देखने के लिए कई सैनिकों ने भारत माता को अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। जान की परवाह किए बिना सरहद पर डटे रहे और पाकिस्तान को पीछे भागने पर विवश कर दिया। आईए जानते है उनमें से कुछ वीर शहीदो और उनके परिवार के बार मे।

शहीद निर्मल चौधरी
शहीदों की मजार पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पे मरने वालों का बाकी यही निशां होगा.। उक्त पंक्तियां कारगिल की लड़ाई के दौरान अपनी जान की बाजी लगाने वाले अमर शहीद निर्मल पर पूरी तरह चरितार्थ होती हैं। निर्मल की शहादत के 17 वर्ष बीत चुके हैं। लेकिन, नक्सल प्रभावित संग्रामपुर प्रखंड के सोहड़ा गांव (शहीद का पैतृक गांव) ही नहीं, बल्कि संग्रामपुर, तारापुर से लेकर मुंगेर तक के लोगों की याद में अब भी निर्मल की शहादत जिंदा है। शहीद की पत्नी सारिका चैधरी को बिहार सरकार ने कार्यालय सहायक की नौकरी दी है। अभी वह तारापुर प्रखंड में कार्यरत हैं। वह बताती हैं कि 14 अगस्त को वे दुश्मनों से लड़ते हुए शहीद हुए थे। ठीक एक दिन पहले इनकी उनसे बातचीत हुई थी। यह कहते-कहते सारिका का गला रूंध जाता है। बमुश्किल आंखों से बहते आंसुओं को पोंछते हुए वह कहती हैं- खुशी इस बात की है कि आज भी लोग उन्हें भूले नहीं हैं। 15 अगस्त हो या 26 जनवरी। शहीद निर्मल के स्मारक पर झंडोत्तोलन करने लोग अवश्य आते हैं।

शहीद रतन सिंह
बिहार रेजिमेंट के कारगिल शहीद रतन सिंह को याद कर आज भी उनकी पत्नी की आंखें छलक जाती हैं। कारगिल के युद्ध में शहीद हुए रतन सिंह की पत्नी मीणा देवी कहती हैं कि इतने सालों बाद भी परिवार में उनकी याद जैसे ताजा बनी हुई है। वे जब शहीद हुए थे तब चारों बच्चे छोटे थे। वे पढ़ाई कर रहे थे। सीमा पर उनके शहीद होने के बाद उन चारों को संभालने की जिम्मेदारी इनके कंधे पर आ पड़ी थी।
छोटा पुत्र मंजेश कुमार सिंह बताते हैं कि नवगछिया के तिरासी में इनका पैतृक निवास है। उस समय इनका परिवार गांव में ही रहता था। वह हॉस्टल में रह कर पढ़ते थे। पिता कारगिल के मोर्चे पर जाने से पहले घर आए थे। मंजेश उन दिनों की बातें बताते हुए कहते हैं कि हालांकि उस वक्त वे काफी छोटे थे पर इन्हें अच्छी तरह याद है कि पिताजी सबों से मिलने के बाद उसे और बड़े भाई रूपेश कुमार सिंह को साथ लेकर रेलवे स्टेशन तक गए थे। इससे पहले कभी भी वे उन दोनों को रेलवे स्टेशन तक साथ नहीं ले गए थे। उन्होंने कारगिल की लड़ाई में हिस्सा लेने की बात भी परिवार के किसी सदस्य को नहीं बताई थी। मंजेश बताते हैं कि स्टेशन पर ट्रेन खुलने के बाद भी पिताजी हम दोनों भाइयों को तब तक देखते रहे थे जब तक हम उनकी आंखों से ओझल न हो गए थे। बाद में खबर में आई कि वे कारगिल युद्ध में देश की रक्षा करते हुए शहीद हो गए हैं। यह खबर सुन कर हमारे परिवार के सदस्यों को जहां भारी दुख पहुंचा, वहां पिताजी के देश के काम आने पर गर्व भी महसूस हुआ। हवलदार रतन सिंह के शहीद होने के बाद सरकार की ओर से परिजनों को पूर्णिया में गैस एजेंसी आवंटित की गई। इससे उनका परिवार पूर्णिया शिफ्ट कर गया। शहीद रतन सिंह के पिता का नाम केदार प्रसाद सिंह और माता का नाम स्नेहलता देवी है। उनके पिताजी को गुजरे काफी समय हो चुके हैं। उनकी मां अभी जीवित हैं। शहीद रतन सिंह के दो पुत्र व दो पुत्रियां हैं। उनकी दोनों पुत्रियों का विवाह हो चुका है। उनका बड़ा पुत्र नवगछिया में शिक्षक हैं। मीणा देवी ने बताया कि उनकी कमी तो खलती है, लेकिन वे देश के लिए शहीद हुए इस बात से स्वयं को बच्चों को संभालने में काफी बल मिला। मंजेश सिंह बताते हैं कि पिताजी को खेल से भी काफी लगाव था।शहीद बेटे की तस्वीर के साथ बैठी माँ।

शहीद रमण झा

कारगिल युद्ध में शहीद हुए सहरसा जिला के बनगांव निवासी शहीद रमण झा के परिजनों को शासन- प्रशासन से कोई शिकायत नहीं है। सरकार ने इस कारगिल शहीद के सम्मान में जितनी भी घोषणाएं की उसमें जिला मुख्यालय में दो कट्ठा जमीन को छोड़कर सभी पूरी की गई। शहीद के पिता फूल झा कहते हैं कि भरी जवानी में अपने सबसे छोटे पुत्र की मौत का सदमा उन्हें जिंदगी भर सताता रहेगा, परंतु सरकार ने एक शहीद का सम्मान करने में कोई कोताही नहीं की। इसलिए उनके परिवार को शासन- प्रशासन से कोई शिकायत नहीं है।
बनगांव निवासी रमण झा वर्ष 1997 में 14 सिख रेजिमेंट में भर्ती हुए। उनके पिता कहते हैं कि बचपन से ही वह अदम्य साहस के लिए जाना जाता था। वह हमेशा कहता था कि मैं ऐसा काम करूंगा कि समाज याद रखेगा। कारगिल युद्ध से पहले जाते समय भी उसने अपने पिता को अपना ख्याल रखने की सलाह देते हुए इसी शब्द का प्रयोग किया था। उसने अपनी उस बात को साबित किया और एक जुलाई 1999 को श्री नगर के बटालिक सेक्टर में आठ घुसपैठियों को मारने के बाद पाकिस्तानी हथगोले का शिकार होकर शहीद हो गया। शहीद हुए अविवाहित रमण झा के भाई को सरकार ने शिक्षा विभाग में नौकरी दी और एक गैस एजेंसी भी है। केन्द्र सरकार ने 25 लाख और राज्य सरकार ने 10 लाख की सहायता राशि भी दिया। मां को आजीवन पेंशन मिलता रहा। शहीद के नाम से जिस पथ की घोषणा हुई थी उस सडक का निर्माण भी हो चुका है। तीन वर्ष पहले शहीद की प्रतिमा का पूर्व राज्यपाल निखिल कुमार ने अनावरण किया था। इनके परिजनों को सरकार से कोई शिकायत नहीं है।

शहीद नीरज

26 जुलाई 1999 आपरेशन विजय की याद आते ही देश वासियों का सीना गर्व से चैड़ा हो जाता है। परंतु आपरेशन विजय के दौरान कारगिल में दुश्मनों को खदेड़ने के क्रम में सीने पर गोली खाकर शहीद होने वाले वीर सपूतों की याद आते ही देश वासियों की आंखे भर आती है। आपरेशन विजय को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए लखीसराय जिले के सूर्यगढ़ा प्रखंड अंतर्गत सिंगारपुर गांव के योगेन्द्र सिंह के पुत्र आर्मी के नायक नीरज कुमार ने भी 12 जुलाई 1999 को कारगिल में दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब देते हुए सीने पर गोली खाकर अपना नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित करा लिया। कारगिल विजय की 17वीं वर्षगांठ ने शहीद नीरज की याद ताजा कर दी है। नीरज की शहादत पर उनकी शिक्षिका पत्नी रूबी कुमारी, पुत्री सुमन कुमारी सहित जिला वासियों को गर्व है कि नीरज ने अपनी शहादत देकर राष्ट्रीय स्तर पर अपने गांव एवं जिला का मान बढ़ाया है। उनकी पत्नी रूबी कुमारी को एक बात हमेशा कचोटती रहती है कि मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद भी सिंगारपुर गांव में शहीद नीरज के नाम पर निर्मित शहीद भवन आधा-अधूरा पड़ा हुआ है। रामपुर गांव के समीप निर्मित शहीद नीरज द्वार पर अब तक शहीद नीरज की प्रतिमा नहीं लगाई गई है। सिंगारपुर गांव स्थित उमवि. सिंगारपुर का कागजी तौर पर शहीद नीरज के नाम पर नामाकरण नहीं किया गया है और न ही रामपुर हाल्ट का नाम शहीद नीरज हॉल्ट किया जा सका है। रूबी कुमारी ने बताया कि 12 जुलाई 1999 को उनके पति नीरज कुमार के शहीद होने के बाद उनका पार्थिव शरीर सिंगारपुर गांव पहुंचने पर तत्कालीन मुख्यमंत्री राबड़ी देवी एवं पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने सिंगारपुर गांव पहुंचकर उन्हें दस लाख रुपये का चेक देते हुए सरकारी नौकरी देने, सिंगारपुर में शहीद नीरज के नाम पर शहीद भवन बनाने, शहीद नीरज के नाम पर उमवि. सिंगारपुर का नामाकरण करने, रामपुर हाल्ट का नामाकरण शहीद नीरज के नाम पर करने एवं रामपुर गांव के समीप शहीद नीरज द्वार बनाकर उस पर शहीद नीरज की प्रतिमा लगाने की घोषणा की थी। घोषणा के ठीक दूसरे दिन यानि 17 जुलाई 1999 को उन्हें शिक्षिका पद पर नौकरी मिल गई। इसके बाद गांव में शहीद भवन का भी निर्माण शुरू हुआ जो अब तक आधा-अधूरा पड़ा हुआ है। शहीद भवन में कीवाड़-खिड़की नहीं लगाई गई है। रूबी कुमारी ने कहा कि रामपुर रेलवे हॉल्ट का शहीद नीरज हॉल्ट नाम नहीं रखा गया है। जबकि नेट पर शहीद नीरज हॉल्ट लिखा हुआ है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री द्वारा की गई घोषणा को जमीन पर उतारना ही उनके पति के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। रूबी को इस बात का भी मलाल है कि शुरूआती समय को छोड़ दें तो किसी भी अवसर पर जिला प्रशासन ने शहीद नीरज को याद करने की जरूरत नहीं समझी है। ऐसे में देश के लिए मर मिटने वाले बेटे की कुर्बानी आज एक परिवार तक सिमट कर रह गई है।
साभारः जागरण

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