28 अप्रैल, 2017
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प्रधानमंत्रीजी…मैं मरना चाहता हूं!

rohtas

रीमा सिंह की रिपोर्ट

रोहतास, 01 अगस्त। यूं तो कहने को इस देश में सभी दानी है। इस देश के राजनेता सहित तमाम वरिष्ठ व उच्चस्तरीय अधिकारी लाखों के लाखों रूपए ट्रस्ट में दान कर देते हैं ताकि उनका नाम बना रहे, लोग उनको भगवान का दूसरा रूप मानंे। लेकिन वहीं दूसरी तरफ जब कोई असहाय गरीब व्यक्ति अपनी परेशानी लेकर इन लोगों के पास जाता है। तब दानी कहलाने वाले इन अधिकारियों के द्वारा केवल आश्वासन ही मिल पाता है जिसके इंतजार में गरीब अपनी जिंदगी से हाथ धो बैठते है। इसी क्रम में रोहतास का एक मामला सामने आया है। जहां अपनी आर्थिक स्थिति से तंग आकर एक दिव्यांग परिवार ने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को पत्र लिखकर इच्छा मृत्यु की इजाजत मांगी है। आश्चर्य की बात है कि जहां एक तरफ बीते कुछ महीनों पहले प्रधानमंत्री जी ने विकलांग को दिव्यांग का रूप देते हुए उन्हें भगवान का भेजा हुआ फरिश्ता कहा था। दिव्यांगों के लिए हर मुमकिन सुविधा उपलब्ध कराने की बात कही थी। वहीं दूसरी तरफ आज एक विकलांग उन्हीं के राज में उनको इच्छा मृत्यु के लिए पत्र लिख रहा है।

बताया जा रहा है कि मामला डेहरी थाना क्षेत्र के न्यू डालमियां के पास की है। जहां बृजमोहन नाम के एक फोटोग्राफर ने कुछ दिन पहले हुए एक ट्रेन हादसे में अपना दोनों पैर गवां दिया। चूंकि बृजमोहन अपने परिवार में कमाने वाला इकलौता लड़का था। इस कारणवश दोनों पैर गवांने के बाद आमदनी का सारा श्रोत बंद हो गया। वहीं अपनी दुर्दशा और
आर्थिक स्थिति से अफसरों को अवगत कराते हुए बृजमोहन ने मदद के लिए गुहार भी लगाई। लेकिन इन अधिकारियों के कान पर जूं तक ना रेंगी और ना ही उन्हें बृजमोहन की हालत पर तरस आया।

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वहीं अपने दोनों पैरों के इलाज के लिए जब बृजमोहन और उनकी पत्नी वाराणसी पहुंचे तब डाॅक्टरों के द्वारा उन्हें बताया गया कि आर्टीफिसियल पैरों के लिए छह लाख एकासी हजार का खर्च आएगा। जिसे सुनकर दोनों के पैरों तले जमीन खिसक गई। क्योंकि अपने पैरों के इलाज में पहले ही बृजमोहन ने अपनी सारी जमा पूंजी खर्च कर दी थी और अब उनके पास फूटी-कौड़ी नहीं बची थी। जब कोई रास्ता नहीं सूझा तो दोनों पति-पत्नी ने केन्द्रीय राज्य मंत्री और सांसद उपेन्द्र कुशवाहा का दरवाजा खटखटाया। जिसके बाद उपेंद्र कुशवाहा ने अपने मद से अनुशंसा तो कर दी लेकिन जिला योजना पदाधिकारी के उदासीन रवैये ने बृजमोहन को हतास कर दिया। कई महीनों तक बृजमोहन सरकारी दफ्तरों और बाबू लोगों के चक्कर काटता रहा पर अफसोस उन्हें कोई जवाब नहीं मिला। जब सारी कोशिशें नाकाम रही तब बृजमोहन ने अपनी जिंदगी त्यागने का निर्णय लिया और प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति को इच्छा मृत्यु के लिए पत्र लिखकर भेज दिया। अब देखना यह है कि क्या दिव्यांग को भगवान का फरिश्ता कहने वाले प्रधानमंत्री भगवान के भेजे हुए इस फरिश्ते की मदद करते हैं या नहीं !

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