04, Dec, 2016
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Bihar Positive: बिहार के इस आइआइटीयन ने विदेश की लाखों की नौकरी छोड़ कर बिहार में खोला गरीब बच्चों के लिए स्कूल

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निखिल झा की प्रस्तुति

पटना, 17 नवम्बर। जब से सोशल मीडिया ने लोगों की जिंदगियों को छुआ है तब से वायरल शब्द लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ है। बिहार के लोगों को लेकर एक कहावत अक्सर सोशल मीडिया में देखने और पढने को मिलता है। “एक बिहारी सब पर भारी”, इस कहावत हो सच कर दिखाया है बिहार के छोटे से गाँव के रहने वाले प्रमोद कुमार ने। बिहार के गोपालगंज के सुदूर ग्रामीण इलाके के रहने वाले प्रमोद कुमार ने जब इंजीनियरिंग की परीक्षा की तैयारी शुरू की तो उसे क्षेत्रीय भाषा में अच्छी किताबों की कमी ने परेशान कर दिया। प्रमोद के माता-पिता बिहार के सुदूर देहात के रहने वाले हैं। प्रमोद के पिता का देहांत उस वक्त हुआ जब प्रमोद बहुत छोटा था। उसकी माँ सिर्फ पांचवी पास थी क्यूंकि स्कूल गाँव से 10 किलोमीटर दूर था। प्रमोद ने सरकारी विद्यालय से अपनी स्कूली शिक्षा ख़त्म करने के बाद आगे की पढाई के लिए शहर आ गए। प्रमोद बताते हैं ” मैंने 12वीं तक की पढाई हिंदी माध्यम से की और मुझे हमेशा लगता था कि अंग्रेजी मेरा कमजोर पक्ष है। मैं अंग्रेजी को लेकर हीन भावना से ग्रस्त था।”

प्रमोद ने आइआइटी बनारस से इंजीनियरिंग समाप्त किया और बाद में आइआइएम कोझिकोड से मैनेजमेंट की पढाई की। लेकिन उसे पता था कि वह बिहार के उन नसीबवाले छात्रों में से एक है जिसे आगे बढ़ने का मौका मिला। वह जानता था कि बिहार में अभी भी लाखों छात्र ऐसे हैं जो समुचित संसाधन के आभाव में कुछ नहीं कर पाते। ऐसा नहीं है कि उनके पास क्षमता नहीं है, लेकिन संसाधन के अभाव में क्षमता किसी काम का नहीं रहता। बिहार के बदहाल शिक्षा व्यवस्था से वह वाकिफ थे। उन्हें विदेश में नौकरी करने का अवसर मिला लेकिन उन्होंने वह नौकरी छोड़ दी।

पिछले वर्ष मार्च में उन्होंने प्रकाश अकादमी नाम से एक संस्थान की स्थापना की, जिसका उद्देश्य बिहार के सुदूर देहात के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध करवाना है। प्रमोद याद करते हुए कहते हैं कि कैसे उन्हें लोगों को समझाने के लिए घर घर जाना पड़ा। लोगों से बात करते समय प्रमोद और उनकी टीम के सदस्य लैपटॉप रखते थे ताकि लोगों को दिखाया जा सके कि दुनिया कितनी बदल गई है। अभिभावक बदली हुई दुनिया को देखकर काफी उत्साहित हुए और उन्होंने अपने बच्चों को संस्थान में भेजना शुरू किया ।

भारत सरकार भी डिजिटल क्लासरूम के महत्व को समझते हुए इसपर जोर दे रही है और प्रमोद भी बच्चों को डिजिटल क्लासरूम के माध्यम से नयी दुनिया दिखने का प्रयास कर रहे हैं। प्रमोद बताते हैं की ऑडियो-विसुअल तकनीक के द्वारा बच्चों को जानकारी देना आसन है और बच्चे बड़ी तन्मयता से डिजिटल क्लासरूम में पढाई करते हैं। बिहार के बच्चों को तकनीक की जानकारी देने से वो अपने आपको महानगरों के बच्चे से पीछे नहीं पायेंगे। ऑडियो-विसुअल क्लास बच्चों को महानगरों के स्कूलों में दी जाने वाली शिक्षा के बराबर एक्सपोज़र देता है। लेकिन जब उन्होंने शुरू किया था तो ये सब करना आसन नहीं था। एक रिपोर्ट के अनुसार सिर्फ 46.6% छात्र ही बिहार में 10वीं की परीक्षा पास कर पाते हैं। बिहार के स्कूलों की वर्तमान स्थिति बहुत दयनीय है। स्कूलों में शिक्षकों और संसाधनों की भारी कमी है। संसाधनों की पूर्ति के बजाय सरकार बच्चों को खिचड़ी बाँट रही है।

प्रमोद ने स्कूलों में प्रयोगशाला की कमी और टेक्स्टबुक में प्रायोगिक विषय की पढाई नहीं होने को बिहार के शिक्षा पद्धति का कोढ़ कहते हुए से टेक्स्टबुक में शामिल करने को जरुरी बताया। यही कारण है कि बिहार के छात्रों को नौकरी ढूंढने में परेशानी होती है। सबसे ज्यादा तकलीफदेह यह है कि ज्यादातर बच्चे बिहार की शिक्षा व्यवस्था में विश्वास न होने के कारण स्कूल बीच में ही छोड़ देते हैं। शुरू में प्रमोद इस पूरी प्रक्रिया को अकेले कर रहे थे और अपने बचाए हुए पैसों से संस्थान को चला रहे थे लेकिन बाद में उन्हें महसूस हुआ कि इस मुहीम को अकेले आगे बढ़ाना संभव नहीं है। उन्होंने एक शिक्षक और कुछ स्टाफ को अपने साथ जोड़ा और अभिभावकों को मासिक 100 रूपये देने का अनुरोध किया। अगर अभिभावक 100 रुपया देने में भी सक्षम नहीं थे तो हम वैसे छात्रों को छात्रवृति देने लगे। यह सुनने में अच्छा लगता है लेकिन बिना पैसे के शिक्षक रखना किसी भी स्कूल के लिए संभव नहीं।

प्रकाश अकादमी में हिंदी माध्यम में पढाई होती है। लेकिन इसके साथ साथ बच्चों को अंग्रेजी और विज्ञानं की भी जानकारी दी जाती है। गाँव से 5 किलोमीटर की दुरी पर होने के कारण बच्चे आसानी से स्कूल आ सकते हैं। प्रमोद के अनुसार वो अपने स्कूल के माध्यम से बदलता बिहार देख रहे हैं। उनको पूरा विश्वास है कि उनकी तरह अन्य युवा भी बिहार के विकास को आगे आयेंगे।

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