23 अप्रैल, 2017
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झुलसते बचपन और स्याह होते भविष्य को सँवारने वाले एक एसपी की दास्तान… आप भी कहेंगे वाह क्या बात है

siksha

कुलदीप भारद्वाज की रिपोर्ट

पटना, 14 नवंबर: जन आस्था के महापर्व छठ के दौरान पूर्णिया के घाटों पर वर्षों से जारी एक विस्थापन रूपी परंपरा की मजबूरियों के मर्म और प्रभाव को रेखांकित किया है। कतारबद्ध जलते चूल्हों की रौशनी में कुम्हलाते बचपन को अशिक्षा के अंधकार में खोता देख पूर्णिया एसपी निशांत तिवारी ने एक प्रयास के तहत शिक्षा की मौन क्रांति से उम्मीद की लौ जलाने का संकल्प लिया। यह अब घुप्प अंधेरे में रौशनी की किरण बनकर मासूम चेहरों पर नए बिहान की तरह आकार ले रही है। आखिर कैसे इस भोर का जुगनू टीमटिमाया आइये इस सच को आईपीएस निशांत तिवारी के संवेदनशील शब्दो के माध्यम से जानते हैं। छठ घाट निरीक्षण के क्रम में कई बार हरदा गया और हर बार नदी किनारे मुझे मिली- कई मासूम जिंदगियाँ! पता चला, कई परिवार अपने बच्चों के साथ मिथिलांचल से सीमांचल हर साल 6-7 महीने के लिए आते हैं। नदी किनारे मखाने का उत्पादन करने। कई बच्चे प्रायः अपने परिवार के सहयोग में रह जाते हैं,स्कूल नहीं जाते हैं। काम ऐसा, कहा जाए तो असेम्बली लाइन जैसा – एक के बाद एक रखे चूल्हे – और उसमें झुलसता बचपन, स्याह होता भविष्य! दिल के मर्म को जगाती जीती जागती तस्वीर। हर बार बात की उनसे-पढ़ने को राजी किया। शाम की पाठशाला की शुरुआत हो गयी है। कई लोगों का सहयोग मिला। रविवार को डीआईजी श्री उपेन्द्र कुमार सिन्हा जी को भी ले गया। ना केवल उन्होंने आग्रह स्वीकार किया, बल्कि बच्चों के लिए खेल सामग्री खुद लेकर आए।
खिलखिलाते बचपन का साक्षात्कार- अविस्मरणीय रहा। कुछ अच्छा करने की कोशिश जारी है। ये महज एक निर्मल नैसर्गिक खिलखिलाहटें भर नहीं बल्कि उम्मीदों की वो मुस्कानें है जो कल को समाज और मुल्क को नए तिमिर के पथिक देंगें। उम्मीदों की लौ जल चुकी है अंधेरा घना है पर उम्मीदों को मुस्कुराना कब मना है।

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