10, Dec, 2016
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दरभंगा : अपने ही पूर्वजों के पोखर मे छठ मनाने से वंचित हैं इस गांव के लोग

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एकलव्य प्रकाश की रिपोर्ट
दरभंगा, 31 अक्टूबर : अतीत में अपने आने वाली पीढ़ी की सुख -सुविधा के लिए पूर्वज पोखर और कुंआ खुदवाते थे। वहीँ पर मंदिर निर्माण करवाते थे और वहां शिलापट्ट पर नाम लिखवाते थे ताकि आने वाली पीढ़ी अपने पूर्वजो के बारे में जान सके। जल की समस्या भी न हो। ऐसे तो मिथिला में पोखर-कुंआ का धार्मिक रूप से बहुत ही महत्व रहा है। प्रसिद्द आस्था का पर्व छठ पूजा पोखर-नदी में ही की जाती है, लेकिन बढ़ती जनसंख्या के कारण अधिकतर पोखर एवं कुँए को लोग भर कर उस पर अपना आशियाना बना रहे हैं, पोखर तो मछली पालन के लिए थोड़ा-बहुत बचा भी है, लेकिन कुआ नहीं के बराबर रह गया है। छठ पूजा का समय नजदीक आते ही लोग पोखरो को साफ़-सफ़ाई में लग जाते हैं। बिहार की प्रसिद्द पवित्र आस्था का पर्व त्यौहार छठ का एक अलग ही महत्व है, शहरों में प्रशासन की तरफ से घाटों की साफ-सफाई की व्यवस्था की जाती है।
लेकिन वहीँ दरभंगा शहर से दूर जिले के तारडीह प्रखंड अन्तर्गत कठरा गाँव के जलेवार मूल के लोग अपने पूर्वजों की श्रमदान से खोदा गया विषहरि पोखैर (पिपरक पोखैर) में छठ करने से वंचित हैं। सिर्फ जलेवार मूल के लोग ही नहीं, वहां के पलेवारटोल, पासवान टोल एवं सोनार टोल के लोग भी इस पोखर से वंचित है। गांव के लोग गंदे छोटे पोखरों में छठ मनाने को मजबूर हैं। पोखर के इर्द-गिर्द बसे लोगों के द्वारा कूड़ा फेकने से पूरा पोखर गन्दा हो चुका है। यहाँ तक की उसमे शीशा एवं गाँव में हुए भोज में बचे-खुचे सरा-गला अन्न भी फेंक देते है। कुछ वर्ष पूर्व उसमे एक घाट का निर्माण किया गया था। लेकिन वो निर्मित घाट भी अब टूट रही है। कोई पोखर किसी एक का नहीं होता इससे पुरे गाँव को फायदा होता है, फिर भी लोग इस तरह के हरकत से बाज नहीं आ रहे है।

क्या है इस पोखर की कहानी

इस पोखर के बारे में लोग बताते हैं कि गाँव की ये सबसे सिद्ध पोखर है। इस पोखर को साक्षात् बिषहरि पाँचो बहन ने रातोंरात खोदी हैं। जलेवार मूल के परमानन्द झा बताते हैँ की अकिया झा जलेवार के पूर्वज थे, वो माँ विषहरि का भक्त थे। वो इस पोखर को खुदवाने का काम शुरू किया, जिस दिन पोखर का खुदाई शुरू हुआ था, उसी दिन रात 12 बजे पड़ोसी गाँव माउँबेहट के पात्र वहां से गुजर रहे थे। उन्होंने देखा की पाँच कन्या पोखर की खुदाई कर रही है, वो उनलोगों को कुछ नहीं बोले। सुबह होते ही अकिया झा के वहां पहुंचे और उन्हें बोले की आप अपने घर की कन्याओं से पोखर खुदवाते हैं, ये अच्छी बात नहीं है। आप समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं। वो (अकिया झा) तुरंत ही अपने घर की कन्याओं को बुलाया एवं उस पात्र से कहा की इस में से पहचानिये कौन थी। पात्र किसी को पहचान न सके और फिर वो चले गए। बाद में अकिया झा माँ विषहरा से पूछे की माँ रात में पोखर कौन खोद रहा था, तो माँ विषहरि ने जबाब दी की हमहीँ पाँचो बहन थी। दूसरी तरफ कम समय में पोखर का खुदाई हो जाना, गाँव में सनसनी पैदा कर दी थी। गाँव के लोगों को समझते देर नहीं लगा की ये किसी तीसरी शक्ति का प्रभाव है, ऐसे भी गाँव के लोग अकिया झा को माँ विषहरा का भक्त मानते थे।

इतनी सिद्ध पोखर होने के बाबजूद लोग उसे भड़ने एवं गन्दा करने में तुले हैं, जलेवार मूल के लोग सरकार से ये आश लगाए बैठे हैं की आज न कल इस पोखर का उराहीकरण होगा, जिससे इसकी काया-कल्प बदल जाएगी। और हम अपने पूर्वजो की इस अनुपम उपहार को बचाये रखने में सफल होंगे, और छठ भी इसी में मनाएंगे। अभी जिस पोखर में छठ होती है, छठ व्रतियों की जनसँख्या के अनुरूप वह बहुत ही संकीर्ण है, जिससे छठ व्रतियों को बहुत कठिनाई की सामना करना पड़ता है, पिछले जनप्रतिनिधियों ने कभी दिलचस्पी नहीं दिखाई। इसके उलटे लोग अपने व्यक्तिगत छोटे-छोटे पोखरों को उड़ाही कर सब फंड लील गया। फिलहाल यह पोखर मत्स्य विभाग के अधीन है।

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4 विचार साझा हुआ “दरभंगा : अपने ही पूर्वजों के पोखर मे छठ मनाने से वंचित हैं इस गांव के लोग” पर

  1. Dhiraj Kumar Jha October 31, 2016

    गलत जानकारी दिया गया है ।।
    यहाँ छठ पूजा बहुत धुमधाम से मनाया जाता है पुरा जलेवार टोल यहीं पे छठ करते है ।।

    • Prasoon Pankaj October 31, 2016

      Jo bhi jankari di gai hai is report me wo us gau k rahne wale prakash ji ne jo ki ek patrakaar bhi hai ne hume bheja hai.prakash ji kolkata se maithili web portel chala rahe hai

    • murari November 6, 2016

      Chath puja sahi me jalebar Bara dhum dham se manata hai.lekin eklabya Prakash ne jo report likhe hai wo bhi bilkul satya hai,khuch bhargh inko barbad karne me laga huya hai.

  2. Hem jha November 1, 2016

    Chhat pooja aaj bhi. Jalewar tol usi pokhar me bade dhoom dham aur utsah ke saath manate hai.

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