30 अप्रैल, 2017
To Advertise on this Website call Us on 9155705448, 8130906081
ब्रेकिंग न्यूज़

NEWS OF BIHAR

छठ पूजा विशेष : बिहार में कैसे आरंभ हुई छठ पूजा, आप भी जानिए यह दिलचस्प कहानी !

chhat-puja

न्यूज़ ऑफ़ बिहार डेस्क : जापान से लेकर प्राचीन यूनान तक में सूर्य की पूजा का प्रमाण मिलता है। उगते सूरज का देश जापान के लोग खुद को सूर्य पुत्र कहते हैं तो यूनान में हीलियस नाम से सूर्य की पूजा होती है। भारत में सूर्य मंदिरों का निर्माण काल पहली सदी से आरंभ हुआ है। उस समय यहां फारसी आए थे। उसी काल में इरान से मग जातियां आई और वे मगध में बसीं। उन्‍हीं जातियों ने मगध में सूर्य की उपासना आरंभ की।

इस ऐतिहासिक संदर्भ के अतिरिक्‍त पौराणिक संदर्भ में कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्‍ण के पुत्र शांब ने सूर्य धामों का निर्माण कराया था। शांब कुष्‍ठ रोगी था। कुष्‍ठ से मुक्ति के लिए शांब ने 12 माह में 12 जगहों पर सूर्य उपासना केंद्र और उससे लगे तालाब का निर्माण कराया था। यथा- देवार्क, लोलार्क, उलार्क, कोणार्क, पुवयार्क, अंजार्क, पंडार्क, वेदार्क, मार्कंडेयार्क, दर्शनार्क, बालार्क व चाणर्क। शांब इन्‍हीं सूर्य उपासना केंद्रों में पूजा अर्चना कर व उससे लगे तालाब में स्‍नान कर कुष्‍ठ रोग से मुक्‍त हुआ था। आज भी छठ महापर्व करने वालों की आस्‍था है कि छठ मइया के प्रताप से कुष्‍ठ रोगी निरोग हो जाता है।

चार दिनों तक चलता है यह महापर्व
चार दिनों तक चलने वाला यह महापर्व बेहद आस्‍था, निष्‍ठा व पवित्रता के साथ मनाया जाता है। छठ का प्रथम दिन चतुर्थी को नहाय-खाय से शुरू होता है। इस दिन व्रती नहाने के बाद अरवा चावल के भात, चने का दाल, कददू की सब्‍जी का भोजन करती हैं। प्‍याज-लहसन खाने की मनाही होती है। अगले दिन पंचमी को खरना होता है, जिसमें व्रती दिन भर उपवास कर शाम को चंद्रमा डूबने से पूर्व स्‍नान कर, लकड़ी के चूल्‍हे पर गुड़ की खीर व रोटी बनाकर पूजा कर प्रसाद ग्रहण करती हैं। इस वक्‍त परिवार के सभी सदस्‍यों का रहना अनिवार्य होता है।

ये भी पढे़ं:-   लवली आनंद ने भरी हुंकार : भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अब आर या पार

षष्‍ठी को व्रती सारे दिन अन्‍न-जल का त्‍याग कर स्‍नान आदि करने के बाद प्रसाद बनाती हैं। इसमें विशेष कर ठेकुआ मुख्‍य होता है। शाम को जलस्रोत में ध्‍यानमग्‍न खड़ी होकर सूर्य को अर्ध्‍य देती हैं। तत्‍पश्‍चात डूबते सूर्य को अर्ध्‍य देते हुए व्रती प्रसाद लेकर हाथ उठाती हैं। प्रसाद में ठेकुआ के अलावा सभी तरह के फल, गन्‍ना, डंठल युक्‍त हल्‍दी-मूली, मिठाई आदि होता है। मन्‍नत के अनुसार, मिट्टी का हाथी व कुर्वा लेकर भी हाथ उठाया जाता है। सूप व दउरा भी मन्‍नत के अनुसार ही तय होता है। रात में घाट पर दीप जलाया जाता है। अगले दिन सुबह सप्‍तमी को उदयाचल सूर्य को अर्ध्‍य देकर व्रत समाप्‍त किया जाता है। बिहार में इस अवसर पर व्रती व उनके परिजन द्वारा बड़े सुंदर लोकगीत गाए जाते हैं जिसमें षष्‍ठी माता व सूर्य देवता का स्‍तुतिगान होता है। व्रत के समापन पर प्रसाद का वितरण होता है।

सौ : अन्य

newsofbihar.com की ख़बरें अपने न्यूज़फीड में पढ़ने के लिए पेज like करें

loading...

अपने विचार साझा करें

आवश्यक लिखें चिह्नित:*

Powered By Indic IME