22 अगस्त, 2017
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‘नॉन रेजिडेन्ट बिहारी’ का अब क्या होगा ?

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पटना, 30 जुलाई। आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के बयान के बाद बिहार में डोमिसाइल नीति पर बहस छिड़ गई है। विपक्षी दल बीजेपी ने भी इस मुद्दे पर राज्य सरकार को समर्थन देने का संकेत दिया है। लेकिन इसके साथ ही हमें एक और पहलू पर ध्यान देने की जरूरत है। ये बात सच है कि ये एक ऐसा राजनीतिक मुद्दा है जिसके खिलाफ कोई राजनीतिक दल बयान देने से परहेज रखना चाहेगा लेकिन आज की तारीख में हकीकत यही है कि अनिवासी बिहारियों की समस्या आने वाले समय में बढ़ सकती है। महाराष्ट्र में शिवसेना और एमएनएस यानि ठाकरे बंधु अक्सर मराठी मानुष मु्द्दे को भड़काते रहते हैं और खासतौर पर वहां बिहारियों को निशाना बनाया जाता रहा है। दिल्ली में भी स्थानीय निवासियों को आरक्षण देने की बात चलती रहती है तब बिहार के नेताओं का तर्क अलग होता है। आज की तारीख में हकीकत यही है चाहे छात्र हों या नौकरी की तलाश में भटकता हुआ बेरोजगार युवक…संसाधनों की तलाश में उन्हें बिहार से बाहर यानि दूसरे राज्यों का रुख करना ही पड़ता है। अगर ऐसा होता है तो असम, महराष्ट्र, दिल्ली सहित अन्य राज्य में डोमिसाइल मामला और अधिक तूल पकड़ सकता है। जिससे बिहार के बहार शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों को ओर नौकरी करने वाले लोगों को परेशानियों का सामना करना पर सकता है।

क्या है मामला
आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने एक दिन पहले राज्य भर में 80 प्रतिशित नौकरी स्थानीय लोगों के लिए आरक्षित करने की बात कही थी। इसके कुछ देर बाद ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सहित बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष मंगल पांडे और सुशील मोदी इस बात पर सरकार का समर्थन करते दिखे।

क्या है डोमिसाइल कानून
डोमिसाइल कानून के तहत स्थानीय युवको को आरक्षण दिया जाएगा। अगर बिहार में इस फैसले पर मुहर लगती है तो सभी शैक्षणिक संस्थानों में 80 फीसदी सीटें बिहार के छात्रों के लिए रिजर्व हो जाएंगी। राज्य सरकार की नौकरियों में भी 80 फीसदी नौकरी बिहार के ही लोगों को मिलेगी।

अन्य राज्य में रह रहे बिहारियों को हो सकती है परेशानी

विशेषज्ञों के अनुसार अगर बिहार सरकार डोमिसाइल कानून पास करती है तो बिहार के बाहर काम कर रहे बिहारियों को परेशानियों का सामना करना पर सकता है। कारण मुंबई, असम, बंगाल, दिल्ली सहित अन्य राज्यों में डोमिसाइल मुद्दे पर कई बिहारियों पर हमले होते रहे हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में भी स्थानीय छात्रों के नामांकन का मुद्दा उठ चुका है। हालांकि इसका एक दूसरा पहलू ये भी है कि झारखंड, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ समेत कई अन्य राज्यों में स्थानीय निवासियों के लिए सरकारी नौकरियों में 80 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है।

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