23 अगस्त, 2017
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बिहार का बदनाम शहर जहां ‘बेटियों के जिस्म’ का सौदा करती है माँ…

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न्यूज़ डेस्क : कहते है की गांव में जब आग लगती है तो घर सभी का जलता है, गरीब या अमीर क्या जानवर भी गांव छोड़कर शहर की तरफ रुख कर लेता है। परिस्थिति के अनुकूल खुद को ढालन उसकी मज़बूरी हो जाती है। कुछ इसी तरह बिहार की बदनाम गली की कहानी भी है, जहां देखते ही देखते परिस्थिति के कारण बदनामी का धंधा करने वाले कुछ लोगों के कारण पूरा शहर अपने नाम नहीं बल्कि अपनी बदनामी के नाम से जाना जाता है।

बिहार में औद्योगिक क्रांति के दृष्टिकोण से विकसित मुजफ्फरपुर जिले का चतर्भुज स्थान जो की इतिहास के पन्नों में मुगलकालीन जमाने से बसा हुआ है जो की वहां स्थित चतुर्भुज मंदिर के नाम पर रखा गया था। यहां कभी काम करने वाली महिलाओं को शिवदासी भी कहा जाता था। लेकिन अब यहां सिर्फ जिस्म का धंधा होता है। यहां के स्थायी लोगों को सरकार के तरफ से नाचने-गाने का लाइसेंस मिला हुआ है लेकिन नाचने-गाने की आड़ में यहां जिस्मफरोशी का धंधा अपना पांव जमा चूका है। यहां के अधिकांश परिवारों का मुख्य पेशा जिस्मफरोशी का धंधा है। इस धंधे में लिप्त महिलाऐं बताती है की हमलोगों के पास रोजगार के लिए इसके अलावा कोई भी रास्ता नहीं है। हम लोग रोजगार भी करना चाहें तो लोग हमें गलत नज़र से देखते है। हम देह व्यापार को ही अपना रोजगार मानते है, ग्राहक का इंतजार करते है, पैसे मिलते है तो घर में चूल्हा जलता है। साथ ही महिलाओं ने यह भी बताया की हम लोग बेटी के जन्म लेने पर ख़ुशी मनाते है। क्योंकि बेटियों का लालन-पालन सिर्फ 10-12 साल ही करना पड़ता है। उसके बाद से वह खुद का लालन-पालन और परिवार चलाने के लायक हो जाती है।

कुछ साल पहले जिला प्रशासन ने इस इलाके में जागरूकता फ़ैलाने के लिए कई तरह के योजनाओं का शुरुआत किया था लेकिन स्थानीय लोगों के सहयोग नहीं मिलने से अधिक सफलता नहीं मिल सकी। प्रशासन ने एक आंकड़ा पेश किया था की इस इलाके में लगभग 40 से 50 प्रतिशत लड़कियां और महिलाऐं यौन संक्रमित है, प्रशासन ने कैंप लगाकर एचआइवी का टेस्ट भी करवाया था जिसमें काफी लड़कियां और महिलाओं के ब्लड में एचआईवी के वायरस मिलने की बात सामने आई थी।

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लेकिन इन सब के वाबजूद भी मुजफ्फरपुर के चतर्भुज स्थान के बासिंदों के जीवन में किसी भी प्रकार का बदलाव नहीं आ रहा है। इस बाबत राज्य सरकार को ठोस कदम उठाना चाहिए। ताकि आर्थिक मज़बूरी में जिल्लत भरी जिंदगी जिनपर मजबूर परिवारों को भी समाज के मुख्यधारा में जोड़ा जा सके, वो भी जिंदगी जी सकें।

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