05, Dec, 2016
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ये कैसा बहार है…जब सब भंगपिसना फरार है ? बिन पिए कैसे जीए..नशेड़ी भाई लोगों की व्यथा कथा

srabi

व्यंगकार निखिल झा की रिपोर्ट

भोरे भोरे आँख को रगड़ते हुए उठते हैं और अखबार खोलते हैं। आपको अभी ही बता देता हूँ की मैं एक आम आदमी हूँ। वैसे तो अखबार और टी वी मेरे जैसे ही आम आदमियों को देश दुनिया की घटनाओं को बताने वाला माध्यम है। लेकिन आप तो जानते ही हैं की एक आम आदमी किस कदर बेहाल है देश में। ऊपर से हम बिहार में जन्मे हैं। अब बिहार में बहार है और बेरोजगारी का प्रसार है। तो भोरे घर से निकलते हैं और रोटी के लिए एड़ी चोटी लगाते हैं। तब जाकर दो वक़्त के भोजन का जुगाड़ होता है। अब आप भी समझ ही गए होंगे की आपकी तरह हमको भी अखबार- वखबार पढ़ने का फुरसत नहीं रहता। लेकिन पिछले पांच महीने से रोज भोरे उठते हैं और अख़बार पढ़ते हैं। मन में एक ही इच्छा होती है की अख़बार के किसी कोने में, मेरे काम की खबर दिख जाए। मेरे काम की कहिये या उन सभी लोगों के काम की खबर जो बेरोजगारी के इस दौर में और महंगाई के इस आलम में दो पैग लगाकर हर गम भूल जाया करते थे। जब से बिहार में दारु बंद हुआ है एक ही खबर ढूंढते हैं की कहीं लिखा हुआ दिख जाए “बिहार में शराब से प्रतिबन्ध हटा”। अखबार को चाटते हुए 5 महीना हो गया लेकिन कमबख्त ये वाक्य है की दिखता नहीं।

ये तो हमने भूमिका बाँधी थी की आपको अपने दर्द से रूबरू करवा सकें। अब असल विषय पर आते हैं। सही सोच रहे हैं आप। जी हाँ, मैं दारुबंदी के दुष्प्रभावों और मेरे जीवन में आये तूफान के बारे ही बात करने वाला हूँ। आज भी पूरा अखबार चाट गए लेकिन नहींए दिखा। अब तो जीवन एक बोझ सा हो गया है भाईलोग। एक समय था जब भोरे से प्रसन्न रहते थे की भर दिन खटेंगे और शाम को दो ठो पैग लगाते ही राजा बन जाएंगे। फिर घर आएंगे और कंधे से ग़मों के बोझ को उतार कर तकिया बना कर सो जाएंगे।

क्या बताएं सब छूट गया। जो ही रुखा सुखा मिलता था खाकर सो जाते थे। अब पता चल रहा है जीना कितना मुश्किल है और पीना कैसे इसको आसान बना देता है। भैया जब से दारु बंद हुआ है मेहनत डबल हो गया है। अब दारु तो मिलता नहीं लेकिन हमको तो नशा चाहिये काहे की भर दिन खटेंगे तो शाम में कुछ न कुछ चाहिये। अरे भाई नींद कैसे होगा बिना नशा किये। इतना जो टेंशन है दुनिया भर का। बेटा का पढाई, बेटी का सगाई, माँ का दवाई सब व्यवस्था करना आसान थोड़े ही है। बाबूजी भी बूढ़ा गए हैं।

मने दारु पीते थे तो जोश रहता था। अब तो भांग और गांजा पर भी आफत हो गया है। हम तो डर से दारु का नाम भी लेना छोड़ दिए हैं। दारु फिर से शुरू होने का खबर तो न सुने और न देखे अभी तक। लेकिन गाँव के गाँव को जेल वाला खबर सब तो कलेजा हिलाकर रख दिया है। भांग से ही काम चला रहे थे जब से दारु बंद हुआ है। लेकिन इधर जब से भांग वाला सबको जेल हुआ है भांग मिलना संजीवनी बूटी मिलने के बराबर हो गया है। मने घर से निकलते हैं आ बाजार जाने के बजाय गाछी जाते हैं। 10 किलोमीटर है घर से। आ रास्ता का क्या कहें।

अभी कल का ही ले लीजिये। सावन का महीना है। बारिश का तो बुझते ही हैं। घर से निकले की बूंदा बांदी शुरू हो गया। पूरा सड़क पर कादो कादो। अब क्या करें? बाइक को वहीं पान के दुकान पर लगा दिए और चल दिए पैदल। उपर से मूसलाधार बारिश आ पैर के नीचे फिसलन वाला मिटटी। किसी तरह फिसलते फिसलते गाछी पहुंचे। पहुँच कर 10 बार खखसे। ये इंडीकेट करने के लिए था की ग्राहक पुराना है। नए और अनजान लोगों को मिलना मुश्किल है। लेकिन हम तो खिलाडी हैं। संघर्ष करके वहां तक पहुंचे थे।

आवाज़ सुनकर महानंद भाई बाहर आये पेड़ के पीछे से। चेहरा जानते हैं इसलिए सामने के झारी में पीस कर रखे हुए भांग से थोड़ा निकाल कर लाते हैं। सी बी आई वाले नजर से चारों तरफ देखते हैं और पास आकर भांग पकड़ा के फिर से गाछी में घुस जाते हैं। हम तो समाजसेवी ही मानते हैं महानंद भाई को। जान जोखिम में डाल कर भांग बेचना अपने आप में बहुत हिम्मत का काम है। क्योंकि दारु बेचने वालों का तो फिर भी इज्जत होता है थाने में। लेकिन भांग बेचते पकड़ा गए तो सुने हैं कि बहुते ठुकाई होता है और समाज में जो फजीहत होना है सो तो है ही।

हम तो फिर भी ठीक हैं लेकिन अपने भास्कर भाई को देख लीजिये। बोल रहे थे ये नितीश कुमार नपुंसक बना दिया है। जब से दारु पीना बंद किये हैं बीवी के सामने मुंह नहीं खुलता। दारु पीते थे तो जोश रहता था। ज्यादा चपड़ चपड़ करती थी तो चार हाथ देते थे। अब दम ही नहीं बुझाता है। उलटा बीवी गरियाती भी है और धुलाई भी करती है।

एकबार रामभरोस को बोले थे इंतजाम करने। ससुरा भर दिन वेट कराया और रात में बोला नहीं हुआ इंतजाम दारु का। मतलब क्या कहें। भांग के लिए आंधी तूफ़ान में कच्ची सड़क से होकर जंगल में जाना पड़ता है। और दारु के लिए सियालदह पकड़ के झारखण्ड। ज़िन्दगी एकदम झंड हो गया है भाई दारु के बिना।

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