05, Dec, 2016
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मैं बोल नहीं सकती, सुन भी नहीं पाती हूं लेकिन मेरे हौसले बुलंद हैं ! एक दिव्यांग लड़की के संघर्ष की कहानी

patna

पटना, 26 अक्टूबर। अगर मन में कुछ करने की जज्बा हो तो मंजिल दूर नहीं होती। हम बात कर रहे है फुलवारीशरीफ की रहने वाली दिव्यांग गुलफशा आलम की। ना ही वह बोल सकती है और न ही वह सुन सकती है। लेकिन जज्बा आसमां छूने का है। गुलफशा के पिता मुजफ्फर आलम ने बताया कि वह जन्म से बोलने और सुनने में अक्षम है। उसके स्कूल टीचर जॉन पॉल ने हमें गुलफशा को पढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया। सेंट जेवियर स्कूल से पढ़ने वाली गुलफशा को 12वीं में 70ः नंबर मिले हैं। वहीं जार्ज पाॅल का कहना है कि शुरू में गुलफशा हमेशा डरी डरी स्कूल आती थी। पर धीरे धीरे उसने अपने आप में बदलाव कर ली। कोई भी बात को बड़ी आसानी से समझ जाती है। अब वह पढ़ लिखकर कुछ बनना चाहती है। तीन भाई-बहनों में सबसे बड़ी गुलफशा हर बात इशारों से समझाती है।

आपको बताते चले कि इसी साल गुलफशा की दाखिला मगध महिला कॉलेज के बीकॉम पार्ट-1 में दिव्यांग कोटे से हुआ है। छात्रा की मेहनत और लगन को देखकर कॉलेज ने हर स्तर पर उसकी मदद करने की बात कही है। बीकॉम के कोऑर्डिनेटर डॉ. जनार्दन प्रसाद ने बताया कि कॉलेज दिव्यांग छात्राओं को पढ़ाने के लिए साइन लैंग्वेज विशेषज्ञ को नियुक्त करता है। यह विशेषज्ञ गेस्ट फैकल्टी ही होते हैं जो दिव्यांग छात्राओं को पढ़ाने में मदद करते हैं। गुलफशा को भी कॉलेज के विशेष शिक्षक पढ़ाते हैं। छात्रा को कॉलेज की ओर से किताबें और पाठ्य सामाग्री दी गई है। प्राचार्या ने उसका विशेष ध्यान रखने का निर्देश भी दिया है।

जब गुलफशा काॅलेज जाती है तो उसकी मां उसे बस में बैठाती है। वह रास्ते में तीन बार मैसेज कर अपनी लोकेशन के बारे में हमें बताती है। आते वक्त भी यही प्रक्रिया दोहराती है। माता पिता कहते है कि हम बहुत खुश है कि मेरी बेटी दिव्यांग होते हुए भी अपनी मेहनत के बल पर मगध महिला कॉलेज में दाखिला ले ली। अब मुझे अपनी बेटी की चिंता नहीं होती है क्योंकि वह अब सामान लड़की की तरह सब कुछ कर रही है।

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