10, Dec, 2016
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अगर आप बेटे के पिता हैं तो इसे जरुर पढ़ें, जानिये कैसे बना सकते हैं आप अपने बेटे को अपना दोस्त

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निखिल झा की प्रस्तुति

पटना, 24 नवम्बर। माँ, एक ऐसा शब्द जिसके उच्चारण मात्र से ह्रदय प्रेम से भर जाता है। माँ विषय पर अनगिनत लेख और कवितायेँ उपलब्ध हैं जो माँ और बच्चे के प्रेम को प्रदर्शित करते हैं। कहा जाता है की माँ प्रेम और करुणा की मूरत होती है। माँ चन्द्रमा की तरह शीतल है और अपने बच्चों को हर मुश्किल घडी में शीतलता देकर उनके मुश्किलों को आसन बना देती है। माँ के प्रेम के वर्णन ने पिता के तप को ढँक दिया है। हम सभी माँ की बात तो करते हैं लेकिन एक पिता के महत्व को अनदेखा कर देते हैं। या यूँ कहें की माँ के प्रेम के आगे पिता का तप हार जाता है। माँ के साथ बच्चों के संबंधों पर आये दिन लेख और किताबें पढने को मिल जाता है जिसे पढ़कर माँ बनने वाली स्त्री अपने होने वाले बच्चे के साथ अपने रिश्तों को बेहतर कर सकती हैं। लेकिन पिता-पुत्र के सम्बन्ध पर कम ही पढने को मिलता है। आइये हम पिता-पुत्र के इस जटिल रिश्ते को समझने का प्रयास करते हैं और जानते हैं की कैसे इस सम्बन्ध को और बेहतर बनाया जा सकता है।

मैंने और शायद आप सभी लोगों ने सुना होगा कि एक बाप को अपने बेटे का बाप कम दोस्त ज्यादा बनना चाहिए। आप किसी भी पिता से पूछ लीजिये कि क्या उनका रिश्ता अपने बेटे के साथ दोस्त जैसा है तो उनका जवाब हाँ होगा। अब आप यही सवाल किसी बेटे से पूछकर देखिये। बेटे के जवाब से आप हैरान हो जायेंगे। ज्यादातर बेटे का जवाब होगा ” अरे नहीं बस पापा को बुरा नहीं लगे इसलिए दोस्तों की तरह बात कर लेता हूँ। पापा को सारी बात बताकर मार खाना है क्या…”
आइये जानें क्यूँ एक पिता अपने पुत्र का मित्र नहीं बन पाता

तुम अभी बच्‍चे हो!
बेटा जब 18 साल का हो जाता है, तो वह खुद को बड़ा और समझदार मान लेता है। लेकिन वो कहते हैं न बाप-बाप होता है और बेटा-बेटा… बस यही एक बात पापा के दिमाग से नहीं निकलती और वह बेटे को नासमझ और बच्‍चा ही मानते रहते हैं। और यह बन जाती है पापा-बेटे के बीच की दोस्‍ती के रास्‍ते का कांटा।

कब लोगे जिम्‍मेदारी?
पता नहीं क्‍यों हर पिता को लगता है कि उनका बेटा कोई भी काम जिम्‍मेदारी से नहीं करता और हर बेटे को लगता है कि पापा बिना वजह हर बात पर ओवर रिएक्‍ट करते हैं। ऐसे में दोनों को चाहिए कि वह साथ बैठ कर इस पर बात करें, लेकिन ऐसा हो नहीं पाता। और इसी के चलते पिता और पुत्र के बीच पनप जाती है एक और गलतफहमी…

तुम्‍हारे बस का काम नहीं…
जब कोई बेटा आगे बढ़ कर किसी काम की जिम्‍मेदारी लेता है तो उसका सारा उत्‍साह तभी खत्‍म हो जाता है, जब पापा कहते हैं – सोच लो, ये काम तुम्‍हारे बस का नहीं है। कहीं बात में कहो कि मुझसे नहीं होगा। अभी मना कर दो…
बस यही एक बात बेटा अपने पापा से कभी नहीं सुनना चाहता। बेटा चाहता है कि पापा उसके साथ खड़े हों, उसे हौंसला और हिम्‍मत दें। ऐसे में जब पिता उसे ये बातें कहते हैं, तो वह उनसे हिचकने और दूर होने लगता है।

ये हैं तुम्‍हारे दोस्‍त?
ज्‍यादातर लड़कों को इस दुनिया में अगर कुछ सबसे प्‍यारा है तो वह हैं उनके दोस्‍त। ऐसे में जब भी पापा अपने बेटे से उसकी संगत और दोस्‍तों की बुराई करते हैं या उन पर ताने कसते हैं, तो बेटों को यह कतई पसंद नहीं आता। पर पापा तो पापा ठहरे उन्‍हें कौन समझाए…

बस आवारागर्दी करते रहो…
कभी-कभी लड़कों को लगता है कि पापा को उनकी हर चीज से दिक्‍कत है। इसके पीछे कई वजहें हैं, जैसे पिता का भरोसा न दिखाना, बेमतलब शक करना उन्‍हें परेशान कर देता है। इस लिस्‍ट में एक और बात तब जुड़ जाती है, जब बेटा भले ही घर का कोई काम निपट कर आया हो और अनजान पिता उसे कह देते हैं कि तुम पूरे दिन आवारागर्दी करते हो… यकीनन कोई भी बेटा अपने पिता से यह बात नहीं सुनना चाहेगा….

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