06, Dec, 2016
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मिथिला का लोकपर्व मौनापंचमी-मधुश्रावणी

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डा. रामसेवक झा

पटना, 24 जुलाई। उत्सवप्रियता भारतीय जीवनकी प्रमुख विशेषता है। देश में समय-समयपर अनेक पर्वों एवं त्योहारों का भव्य आयोजन इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। श्रावण मास के कृष्ण
पक्ष की पंचमी तिथि को मौनापंचमी त्योहार नागदेवताओं को समर्पित है । इस त्योहार पर व्रतपूर्वक नागों का अर्चन-पूजन किया जाता है। वेद एवं पुराणों में नागों का उद्गम महर्षि कश्यप और उनकी पत्नी कद्रू से माना जाता है। नागों का मूलस्थान पाताललोक प्रसिद्ध है। पुराणों में नागलोक की राजधानी के रूपमें भोगवतीपुरी विख्यात है। संस्कृतकथा-साहित्य में विशेषरूपसे ‘ कथासरित्सागर ’ नागलोक वहाँ के निवासियों की कथा से ओतप्रोत है । गरुड़पुराण, भविष्यपुराण, चरकसंहिता, सुश्रुत-संहिता, भावप्रकाश आदि विविध ग्रन्थोंमें नागसम्बन्धी विषयों का उल्लेख मिलता है। भगवान विष्णु की शय्या की शोभा नागराज शेष बढ़ाते हैं। शिव एवं गणेशजी के अलंकरण में नागों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। पुराणों में भगवान् सूर्य के रथमें द्वादश नागों का उल्लेख मिलता है। भारतीय संस्कृतिमें देवरूपमें नागदेवता स्वीकार किये गये हैं। हमारे ग्राम-नगर में ग्रामदेवता और लोकदेवताके रूपमें नागदेवताओं के पूजास्थल हैं ।

मिथिला में प्रसिद्ध 48 प्रकारके त्योहारों का विधान है। त्योहारों का प्रारम्भ श्रावणमास के कृष्णपक्षकी पंचमी तिथि से होता है । इस दिन सर्पकी माता विषहारा ( मनसादेवी) का जन्मोत्सव मनाया जाता है । इस तिथि को प्रत्येक घरों में नागदेवताओं का पूजन-अर्चन विधि विधान के साथ किया जाता है। इस दिन हरेक परिवारों से मिटट्ठी की कलशा लेकर गाँव के प्रसिद्ध विषहारा स्थान जाते हैं। वहाँ दूध, लावा, दूध-दीपों से नागदेवताओं का पूजन कर वर्षभर नागविष और भयसे रक्षा हेतु कामना करते हैं। एक परम्परा विशेषके तहत लोग इस दिन भोजन से पूर्व नीम के पत्ते व निम्बू खाने की प्रथा भी कहीं कहीं देखने को मिलती है। कहा जाता है कि एक बार मातृ-शापसे नागलोक जलने लगा। इस दाहपीडा की निवृत्ति के लिये इस तिथि को गो दुग्धस्नान जहाँ नागोंको शीतलता प्रदान करता है, वहीं भक्तों को सर्पभय से मुक्ति भी देता है। महिलाएं मिट्टी की थुमहा आँगन में बनाकर पूजा करती है तथा घर के प्रवेश द्वारा पर गोबर से विषहारा का भी निर्माण करने की प्रथा देखने को मिलती है। इसदिन मिट्टी व लावा पंडितों द्वारा अभिमंत्रित कर सभी लोग अपने घरों में संध्याकाल छीटते है ।

श्रावणमास के कृष्णपक्ष की पंचमी तिथि से ही नवविवाहिता स्त्रियाँ मधुश्रावणी पूजारम्भ करती है। यह पूजा लगातार तेरह दिनोंतक चलती हुई श्रावणमास के शुक्लपक्षकी तृतीया तिथि को विशेष पूजा-अर्चना के साथ व्रत की समाप्ति करती है। इन दिनों नवविवाहिता स्त्रियाँ व्रत रखकर गणेश, चनाई, मिट्टी एवं गोबर से बने विषहारा एवं गौरी-शंकर का विशेष पूजा कर महिला पुरोहिताईन से कथा सुनती है। कथा का प्रारम्भ विषहरा के जन्म एवं राजा श्रीकर से होता है ।
इस व्रत के द्वारा स्त्रियाँ अखण्ड शोभाग्यवती के साथ पति की दीर्घायु होने की कामना करती है । व्रत के प्रारम्भ दिनों में ही नवविवाहिता स्त्रियों के ससुराल से पूरे तेरहों दिनों के व्रत के सामग्रीयाँ तथा सूर्यास्त से पूर्व प्रतिदिन होने वाली भोजन सामग्रीयाँ भी वहीं से आती है । शुरु व अन्तिम दिनों में व्रतियों द्वारा समाज व परिवार के लोगों में अंकुरी बाँटने की भी प्रथा देखने को मिलती है । प्रतिदिन पूजन के उपरान्त नवविवाहिता अपने सहेलियों के साथ गाँव के आसपास के मन्दिरों एवं बगीचों में फूल लोढ़ती हुई ब्रत का भरपूर आनन्द भी लेती है । मधुश्रावणी के दिन जलते दीप के बाती से शरीर कुछ स्थानों पर दागने की परम्परा भी वर्षों से चली आ रही हैं । अलबता जो भी हो मिथिला की लोक आस्था का यह महापर्व बहुत ही धूम-धाम के साथ मनाया जाता है ।

नोट: लेखक आदिनाथ मधुसूदन संस्कृत महाविद्यालय,रहुआ-संग्राम, मधुबनी, बिहार में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।

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3 विचार साझा हुआ “मिथिला का लोकपर्व मौनापंचमी-मधुश्रावणी” पर

  1. विनित.झा July 25, 2016

    मिथिलाधाम महान अइछ एकर कोनो जबाव नहीं

  2. satish jha July 26, 2016

    Named mithla mahan

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