29 अप्रैल, 2017
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‘कोशी’ को लेकर कलाम की ख्वाहिश जो अधूरी रह गई….’कलाम’ को कोशी बुला रही है, कलाम की पहली बरसी आज

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रोशन कुमार मैथिल की रिपोर्ट

पटना, 27 जुलाई। बिहार का शोक कही जाने वाली कोशी आज एक बार फिर उफान पर है। कोशी के कहर से आज एक बार फिर कोहराम मचा हुआ है। मिसाइल मैन के नाम से मशहूर पूर्व राष्ट्रपति डॉ अब्दुल कलाम की आज पहली बरसी है। अब आप सोच रहे होंगे की कोशी और कलाम का क्या संबंध। क्योंकि कलाम तो दक्षिण भारत के रामेश्वरम के रहने वाले थे और कोशी तो बिहार की नदी है। लेकिन कलाम जैसी शख्सियत को क्या किसी एक शहर या फिर किसी एक राज्य की सीमा में बांधकर रखा जा सकता है। कलाम तो समूचे देश के थे और सारा देश कलाम का था। पिछले साल आज के दिन 27 जुलाई को ही उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली। वैसे तो कलाम साहब को देश के प्रत्येक प्रांत और छात्र-छात्राओं से विशेष लगाव था। लेकिन कुछ तो था जिसके कारण वह बार बार बिहार से खास लगाव रखते थे। एक तरह से कहा जाए तो माता सीता का नैहर उन्हें बार बार लुभाता था। यहां के लोगों के बाद कलाम साहब को किसी से लगाव था तो वह थी कोशी नदी। एकबार उन्होंने खुद कहा था कि वे कोशी को नजदीक से देखना चाहते हैं और उसके किनारे समय बिताना चाहते है। अफसोस उनकी यह ख्वाहिश पूरी न हो सकी और कलाम इस दुनिया को विदा कह गए। कोशी के किनारे रहने वाले लोगों को इस बात का दुख है कि काश एक बार यहां कलाम पहुंच जाते तो शायद कोशी के कहर से पूरी तरह निजात दिलाने का कोई ना कोई उपाय निकल सकता था।

दरभंगा के बाउर गांव के रहने वाले और उनके सहकर्मी सह वैज्ञानिक मित्र डाॅ मानस बिहारी वर्मा कहते है कि मिथिला के लोगों से उनका लगाव ही उन्हें बार बार मिथिला आने पर विवश करता रहा। यहां के किसानों की समस्याओं को ध्यान में रखकर ही उन्होने नदी जोड़ो अभियान की बात कही थी। वे यहां के ग्रामीण क्षेत्र में रह रहे बच्चों के लिए एक ऐसा स्कूल का निर्माण करना चाहते थे, जहां वो सब सुविधाएं उपलब्ध हो जो बड़े शहरों के स्कूलों में रहती है। वे मिथिला क्षेत्र के बच्चों में वैज्ञानिक सोच पैदा करना चाहते थे। इसी कारण उन्होंने अगस्तया फाउंडेशन का काम उन्होंने बिहार के लिए मुझे सौपा था। इस योजना के तहत उन्होंने साइंस वैन तक उपलब्ध करवाई थी।

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