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ग्राउंड जीरो रिपोर्ट : सीवान में शहाबुद्दीन का आतंक…’अब शहाबुद्दीन जउन चाहिएं उहे करीहें’ !

sahabuddin

एबीपी न्यूज के वरिष्ठ पत्रकार रणवीर की रिपोर्ट का खास अंश

सीवान, 16 सितम्बर। ‘साहेब’ शहाबुद्दीन जेल से बाहर है और लोगों में दहशत। दो दिन सिवान में रिपोर्टिंग के दौरान मुझे जो अनुभव हुआ, उससे साफ ज़ाहिर है कि यहाँ लोगों में भयानक डर का माहौल है।

सिवान से बलिया जाने वाली सड़क पर चाय की दूकान पर बैठे रामेश कहते हैं, “ए बाबू, अब शहाबुद्दीन के आदमी आइहैं और तोहसे तोहार घडी मंगिहें। नाही देबा त~ चूट देना गोली मरिहैं आ पुट देना घडी ले के चल जइहें”. अब ऊ जउन चाहिएं उहे करीहें। (शाहबुद्दिब के लोग आएंगे और आपसे आपकी घडी मांगेंगे और ना देने पर गोली मारकर घडी लेंगे और चले जायेंगे। अब शहाबुद्दीन जो चाहेंगे वो करेंगे)

ऐसे बहुत से उदाहरण रमेश ने मुझसे बताए। ये पूछने पर कि प्रशासन क्या करता है। रामेश ने कहा कि अब प्रशासन का कोई मतलब ही नहीं रह जायेगा। डीएम-एस पी को भी अपनी नौकरी बचाना है न, रमेश ने कहा। उन्होंने कहा कि पहले तो शहाबुद्दीन एसपी को बात ना सुनने पर पटक के मारता था।

एक पगडण्डी के किनारे बैठे अछेबर प्रसाद से शहाबुद्दीन की रिहाई पर बात करने पर उन्होंने कहा कि पहले से ही वो सूखे की वजह से परेशान थे, लेकिन अब तो यही भरोसा नहीं कि हमारी थोड़ी सी ज़मीन कबतक हमारी रहेगी। करीब 65 साल के अछेबर ने कहा कि उन्हें वो दिन याद हैं, जब शहाबुद्दीन को कोई ज़मीन पसंद आती थी तो उसके आदमी ज़मीन के मालिक के पास आकार 5-10 हज़ार रुपये देकर कहते थे कि ज़मीन लिख दो वरना जान नहीं रहेगी तो ज़मीन का क्या करोगे?

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ऐसे कई रमेश और अछेबर हमें सिवान ज़िले में मिले। कुछ लोगों ने हमारे हाथ में माइक और कैमरा देखकर हमसे दूरी बनाए रखना ही सही समझा। उन्हें लगता है कि अगर टीवी में उनकी शक्ल दिखी तो शायद उनके लिए बड़ी मुसीबत आ सकती है।

एक स्थानीय पत्रिका निकलने वाले पत्रकार (नाम जेहन से उतर गया) ने शहाबुद्दीन के घर के पास बातचीत में कहा कि आने वाले दिनों में गोरखपुर और बलिया जैसे शहरों में ज़मीन के दाम बढ़ने तय है क्योंकि शहाबुद्दीन की वापसी होने से सिवान के बड़े व्यापारी यहाँ से बाहर जाना ही पसंद करेंगे। उनका मानना है कि जिस तरह का आतंक यहाँ के व्यवसायियों ने देखा है, अब वो वापस उसे नहीं देखना चाहेंगे।

एक बुजुर्ग से ये सवाल करने पर कि जब इतना डर है तो आप लोग उन्हें जिताये क्यों? इसपर उस बुजुर्ग ने कहा, “बाबू का करबा, केहू उनके खिलाफ लड़े नाही सकेला, लड़ी ता~ मार खाई। देखा उनकर मेहरारू दू बार लाडळीं लेकिन हार गइलीं ना।” (क्या किया जा सकता है, कोई भी शहाबुद्दीन के खिलाफ लड़ेगा नहीं क्योंकि लड़ेगा तो मार खायेगा। उनकी पत्नी दो बार लड़ी लेकिन हार ही गई)

सरकारी नौकरी की तैयारी में लगे संदीप यादव बताते हैं कि नीतीश कुमार को सिर्फ शराबबंदी से मतलब है, जिससे कोई फायदा नहीं हो रहा। संदीप ने कहा कि गरीब आदमी को पुलिस पकड़ लेती है, लेकिन अमीर आराम से शराब पी रहा ही। उनका मानना है कि अब शराब पीकर पकडे जाने वाले लोगों को ज़रूर आराम हो जायेगा, क्योंकि पकडे जाने पर को पुलिस को शहाबुद्दीन का आदमी बताकर आसानी से छूट जायेंगे।

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हालाँकि इन सबके बीच इस बात और उभरकर सामने आयी कि शहाबुद्दीन के बेहद करीबी लोग मीडिया से सम्बन्ध अच्छा करके भी रखना चाहते हैं। घर के बाहर शहाबुद्दीन के वापस आने के इंतज़ार के दौरान कई बार तैयारियों में लगे लड़कों ने हमसे चाय पानी पुछा। हालाँकि शहाबुद्दीन के समर्थक ज़रूर हमें धमकाते करे। कुछ ने कहा कि तुम्हारा चैनल साहेब के खिलाफ खबर दिखा रहा है। खबर रुकवा दो वरना उठवा लेंगे। कुछ ने देख लेने की भी धमकी दी। तो कुछ ने निपटाने के दावे भी किये।

ऐसे में यहाँ से अनुभव से साफ़ है कि स्थानीय लोगों में शहाबुद्दीन की रिहाई की वजह से डर है। लोग एक बार फिर बहार की जगह लालू राज की वापसी मान रहे हैं। ऐसे में नीतीश कुमार का प्रधानमंत्री बनने का सपना कहीं उन्हें ‘चौबे गए छब्बे बनने, दुबे बनकर आ गए’ वाली कहावत का उदहारण ना बना दे।

(सिवान से कैमरामैन विशेष पांडेय के साथ रणवीर की रिपोर्ट)

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ऐक विचार साझा हुआ “ग्राउंड जीरो रिपोर्ट : सीवान में शहाबुद्दीन का आतंक…’अब शहाबुद्दीन जउन चाहिएं उहे करीहें’ !” पर

  1. manoj kumar Singh September 18, 2016

    बिलकुल सही बात है

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