06, Dec, 2016
ब्रेकिंग न्यूज़

NEWS OF BIHAR

हरतालिका तीज : इस विधि से करें व्रत, पूरी होगी मनोकामना !

Teej-Tyohar

सरिता कुमारी की रिपोर्ट
NOB डेस्क : हरतालिका तीज व्रत महिलायें बड़ी उत्साह से मनाती है। हरतालिका तीज का व्रत हिन्दू धर्म में सबसे बड़ा व्रत माना जाता है। यह तीज का त्यौहार भादो की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनायी जाती है। इस व्रत को गौरी तृतीया व्रत भी कहते है। इस बार हरतालिका तीज 4 सितम्बर रविवार को मनाया जाएगा। आपको बताते चले कि यह व्रत लड़की भी सकती है। हरतालिका तीज में भगवान शिव, गौरी और गणेश जी की पूजा की जाती है। यह व्रत निराहार और निर्जला किया जाता हैं।

क्यों रखा गया इस व्रत का नाम हरतालिका
माता गौरी के पार्वती रूप में वे शिव जी को पति रूप में चाहती थी। जिस हेतु उन्होंने कठिन तपस्या कर रही थी। उस समय पार्वती की सहेलियों ने उन्हें अगवा कर ली थी। इसी कारण इस व्रत का नाम हरतालिका व्रत पड़ गया। क्योंकि हरत मतलब अगवा करना और आलिका मतलब सहेली अर्थात सहेलियों द्वारा अपहरण करना हरतालिका कहलाता हैं। शिव जैसा पति पाने के लिए कुँवारी कन्या इस व्रत को विधी विधान से करती हैं।

तीज व्रत की पूजन सामग्री
गीली काली मिट्टी अथवा बालू रेत, केले का पत्ता, फूल पत्ते और सभी प्रकार के फल, माता गौरी के लिए पूरा सुहाग का सामान,घी, तेल, दीपक, कपूर, कुमकुम, सिंदूर, अबीर, चन्दन।

जानिये हरतालिका तीज व्रत के नियम और पूजन विधि के बारे में
हरतालिका व्रत निर्जला किया जाता है। पूरा दिन और पुरी रात जल ग्रहण नहीं किया जाता है। हरतालिका व्रत कुवांरी कन्या, सौभाग्यवती महिलाओं द्वारा किया जाता हैं। इस व्रत का नियम है एक बार प्रारंभ करने के बाद छोड़ा नहीं जाता है। इसे व्रत को प्रति वर्ष पुरे नियमों के साथ किया जाता हैं। तीज व्रत को पूरी रात महिलायें एकत्र होकर नाच गाना और भजन करती हैं। नये वस्त्र और सोलहों श्रंगार करती है। हरतालिका पूजा दिन रात के मिलने के समय में किया जाता है। हरतालिका पूजन के लिए शिव, पार्वती और गणेश जी की प्रतिमा काली मिट्टी या बालू लेकर हाथों से बनाई जाती हैं। जहां पर स्थापना किया जाता है। वहां पर पहले रंगोली बनाई जाती है। इसके ऊपर पटा अथवा चैकी रखी जाती हैं। चैकी पर एक थाली रखते हैं। उस थाली में केले के पत्ते को रखते हैं। फिर तीनो प्रतिमा को केले के पत्ते पर बैठा दिया जाता है। फिर एक कलश में जलभर उसके ऊपर फल रखतें है। दीपका जलाते है। कलश के मुंह पर लाल धाग बांधते हैं। कलश पर अक्षत चढ़ाया जाता है। फिर कलश का पूजन किया जाता है। सबसे पहले जल चढ़ाते हैं फिर धागा बांधते हैं कुमकुम हल्दी चावल चढ़ाते हैं फिर पुष्प चढ़ाते हैं। कलश के बाद गणेश जी की पूजा की जाती है। उसके बाद शिव जी की पूजा की जाती है। इसके बाद माता गौरी की पूजा की जाती है। माता गौरी को सम्पूर्ण श्रंगार चढ़ाया जाता हैं। सके बाद हरतालिका व्रत की कथा पढ़ी या सुनी जाती है। फिर आरती की जाती है। पूजा के बाद भगवान की परिक्रमा की जाती है। रात भर जागकर पांच पूजा एंव आरती की जाती हैं। सुबह आखरी पूजा के बाद माता गौरा को जो सिंदूर चढ़ाया जाता है। उस सिंदूर से सुहागन स्त्री सुहाग लेती हैं। ककड़ी और हलवे का भोग लगाया जाता है। उसी ककड़ी को खाकर उपवास को तोड़ी जाती है। अंत में सभी सामग्री को एकत्र कर पवित्र नदी या तालाब में विसर्जित किया जाता है। इस व्रत को रखने पर न खाए खाना नहीं तो बन सकते अगर आप इस व्रत को रखने के दौरान जो सोती है। वो अगले जन्म में अजगर बनती हैं। जो दूध पीती हैं वो सर्पिनी बनती हैं। जो व्रत नहीं करती है वो विधवा बनती हैं जो शक्कर खाती हैं वह मक्खी बनती हैं। जो मांस खाती है वह शेरनी बनती हैं। जो जल पीती हैं वह मछली बनती हैं। जो अन्न खाती हैं वो सुअरी बनती हैं। जो फल खती है वह बकरी बनती हैं।

newsofbihar.com की ख़बरें अपने न्यूज़फीड में पढ़ने के लिए पेज like करें  

 
 

newsofbihar.com की ख़बरें अपने न्यूज़फीड में पढ़ने के लिए पेज like करें

newsofbihar

अपने विचार साझा करें

आवश्यक लिखें चिह्नित:*

Powered By Indic IME