09, Dec, 2016
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रक्षाबंधन तब और अब, आज भाई-बहन का त्योहार लेकिन अतीत में ऐसा नहीं था

Rakhi-Tyohar

रोशन मैथिल की रिपोर्ट

पटना, 11 अगस्त। श्रावणी पूर्णिमा अर्थात वह दिन जिस दिन भाई-बहन के बीच मनाए जाने वाला पावन पर्व रक्षाबंधन मनाया जाता है। देश भर के विभिन्न भागों में इस पर्व का आयोजन किया जाता है। बिहार में भी लोग इसे धूमधाम के साथ मनाते हैं। इस दिन स्नान-पूजन से निवृत हो नव वस्त्र पहन बहन अपने भाई के माथे पर चंदन लगाती है। आरती उतारती है। रक्षासूत्र (राखी) बांध सदैव अपनी रक्षा का वचन लेती है। भाई को मिठाई भी खिलाया जाता है। भाई रक्षा का वचन देने के साथ-साथ बहन को उपहार भी देता है। राखी पर्व का यह स्वरूप अतित का नहीं अपितु वर्तमान समय का है। रक्षा बंधन को लेकर हम आपको अतीत में ले जाना चाहते हैं। जनक की नगरी और मां सीता की पावन भूमि मिथिला मे मनाए जाने वाले राखी का स्वरूप वर्तमान से थोड़ा भी मेल नहीं खाता है। मिथिला में तो कभी भी यह पर्व भाई-बहन का था ही नहीं। यहां तो भाई-बहन के बीच व्याप्त प्रेम के लिए ‘भ्रातृ द्वितीया’ अर्थात् भईया दूज मनाने की परम्परा रही है। इसके अतिरिक्त ‘सामा चकेबा’ भी यहां भाई-बहन के पर्व के रूप में मनाया जाता है। इसमें बहन छठ पर्व के पारन दिन से सामा खेला जाता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन जब सामा को बिदा किया जाता है तब भाइ सामा की डोली को कंधा लगा विदा करते हैं। कहीं-कहीं पर तो सामा तोड़ने की परम्परा है। इस दिन बहन अपने-अपने भाईयों का फाँड़ अर्थात गोद भरती है। इस सत्यता को जानने के लिए इतिहास के पन्नों में अधिक डूबकी लगाने की आवश्यकता नहीं है। अब भी अपने समाज मे ऐसे बहुत लोग मिल जाएंगे जिनकी उम्र 70-80 हो। थोड़ा उनसे पूछ कर देख ले कि जब वे बच्चे थे तब क्या वह अपनी बहन से राखी बंधवाते थे? इसी उम्र की किसी महिला से पूछिए कि जिस तरह वर्तमान समय में राखी का पर्व मनाया जाता है वैसे उन्होंने अपने भाई की कलाई पर राखी बांधा है या नहीं ? उत्तर निश्चित रूपसँ निगेटिव होगा। इस उम्र के किसी भी वृद्ध से पूछने पर जवाब साधारण सा होगा कि पहले मिथिला में रक्षाबन्धन के दिन बहन अपना भाई को राखी नहीं बांधती थी।

इससे थोड़ा कम उम्र वाले व्यक्ति से भी ऐसा ही जवाब मिल सकता है। कुछ लोग तो यह भी कह सकते हैं कि उनके समयमे पण्डित-पुरोहित रक्षा सूत्र बांधते थे। हालांकि बहनों ने भी राखी बांधना आरंभ कर दी थी। यही सच है। हमारे यहां पण्डित-पुरोहित रक्षासूत्र बांधते थे। वर्तमान समय में भी रक्षाबन्धन के दिन हाथ में रक्षासूत्र लेकर यजमान को बांधने के लिए जगह-जगह पंडित-पुरोहित नजर आते हैं। अभी भी यह परम्परा कहीं-कहीं चल रहा है, लेकिन नाम मात्र का। आधुनिकता की इस आंधी में हम इतने अंधे हो चुके हैं कि अपनी परम्परा को इग्नोर कर चुके हैं। कई विद्वानों ने इस बात को अपने-अपने आलेखों में मेंशन भी किया है। प्रसिद्ध दैनिक पत्र ‘मिथिला मिहिर’ के 1936 मे प्रकाशित ‘मिथिलांक’ में ‘मिथिला में प्रचलित कुछ पर्व त्यौहार’ शीर्षक आलेख में जीवानन्द ठाकुर लिखते हैं कि रक्षाबन्धन में ब्राह्मण ‘येनबद्धो’ मंत्र से रक्षा (राखी) बांधते थे। मैथिली भाषा-साहित्य के भीष्मपितामह कहे जाने वाले आचार्य सुरेन्द्र झा ‘सुमन’ ने अपनी पुस्तक ‘मन पड़ैत अछि’ में लिखते हैं कि सिनेमा के प्रभाव में रक्षाबन्धन भाई-बहन का पर्व बन गया। मैथिली साहित्य के शिखर-पुरुष पण्डित श्रीचन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’ अपनी जीवनी ‘अतीत मन्थन’ में लिखते हैं कि ‘आज रक्षा बन्धन का जो परिवर्तित स्वरूप दिख रहा है वह ‘पोरस’ नामक सिनेमा आने के बादप्रचलित हुआ और यह पर्व भाई-बहन के पर्व के रूप में मिथिला में भी फैल गया।

छोटी लड़की को भी बांधा जाता था रक्षा-सूत्र

जानकार बताते हैं कि पण्डित-पुरोहित रक्षा-सूत्र लेकर घर से निकलते थे। यजमान के यहां पहुंच ‘येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः तेन त्वां प्रतिबध्नामि रक्षे मा चल माचलः’ मंत्र के संग घर-परिवार के सभी सदस्य को रक्षा-सूत्र बांधते थे। छोटी लड़की को भी राखी बांधा जाता था। पुरुष वर्ग राईट हैंड में और फीमेल मेंबर लेफ्ट हैंड में पण्डितों से रक्षा-सूत्र (राखी) बंधवाते थे। यजमान पण्डित को विधिवत दक्षिणा देते थे। कहीं-कहीं पर तो घर के सबसे बड़े सदस्य अपने से छोटे उम्र के व्यक्ति को रक्षा-सूत्र बांधते थे।

पण्डित श्रीचन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’ अपनी पुस्तक ‘अतीत मन्थन’ में महाराज रामेश्वर सिंह के प्रसंग का उल्लेख करते हुए लिखते है- ‘श्रावणी पूर्णिमा के दिन महाराजाधिराज रामेश्वर सिंह
रक्षाबन्धन पर्व के अवसर पर पूर्ण राजकीय वेषमे वर्तमान कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के आॅडिटोरियम में आनन्दबाग में बैठते थे। आगे में तीन चांदी की वर्तन में टाका, अठन्नी आ चअन्नी रखा रहता था। दक्षिणा में पुरोहित, अध्यापकों को एक टाका, ब्राह्मण को अठन्नी, छात्र समुदाय और गरीबों को चअन्नी दिया जाता था।’ राखी से सम्बन्धित लोक गीतों की अनुउपलब्धता भी इस बात का पुष्टि करती है कि यह पर्व मिथिला में कभी भी भाई-बहनों का नहीं था।

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साभार: प्रो अमलेंदु शेखर पाठक

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