28 अप्रैल, 2017
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‘झिझिया’ के कातिल झूम रहे हैं डांडिया की धुन पर….विलुप्त होने के कगार पर अपना एक लोकनृत्य !

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अमित सिंह की रिपोर्ट

झिझिया मिथिला का एक प्रमुख लोक नृत्य है। दुर्गा पूजा के मौके पर इस नृत्य में लड़कियां बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेती है। इस नृत्य में कुवारीं लड़कियां अपने सिर पर जलते दिए एवं छिद्र वाली घड़ा को लेकर नाचती हैं।
कलशस्थापना से शुरु होने वाला ‘झिझिया नृत्य’ की तैयारी महिलाएं महीनों पहले से करती है । मिटटी के घड़ों को रंग-बिरंगे रंगों से सजा कर अनगिनित छिद्र कर दिया जाता है। उसके वाद झिझिया के अन्दर दीप जलाकर पहले किसी धामी से मन्त्र द्वारा बाँधते है इसके बाद ‘तोहरे भरोसे बरहम बाबा झिझिरी बनेलियै हो, कोठाके उपर डैनियाँ, खिडकी लगैले ना, झिझिर खेले गईलोमे बाबा चँहुपरिया जैसे मनमोहक गानों पर नृत्य शुरू करती है। इस नृत्य में महिलाओं द्वारा एक साथ ताली वादन तथा पग-चालन से जो समा बंधता है, वह अत्यंत ही आकषर्क व् मनमोहक होता है। नेपाल के तराई क्षेत्र में झिझिया नृत्य में महिलाओं के साथ पुरुष भी शामिल होता है।

दुर्भाग्यवश आधुनिकता के दौर में ये लोक नृत्य झिझिया अब विलुप्त होने के कगार पर है लिहाजा नृत्य की इस शैली का संरक्षण करना बहुत ही जरुरी है। एक वजह ये भी है कि पढ़े-लिखे समाज के लोग इस तरह के लोकपर्व और नृत्य में हिस्सा लेना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं। उन्हें लगता है की ऐसा करने से वो आधुनिकता के दौर में पीछे रह जायेंगे। हमें इस तरह की विकृत मानसिकता से बाहर निकलना होगा ताकि हम अपनी सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण कर सके।

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