10, Dec, 2016
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सामा खेलअ गेलली हे…. जानिये बिहार के लोकपर्व सामा-चकेवा के बारे में

shama-chakeva

मो. हसनैन की खास रिपोर्ट

शिवहर, 08 नवम्बर। शिवहर प्रखंड का मिर्जापुर धोबाही गाँव हिंदू-मुस्लिम एकता को प्रदर्शित करता है। इस गाँव में दोनों समुदाय की महिलाएं साथ में सामा-चकेवा खेलती हैं। सामा-चकेवा का यह खेल इस गाँव की महिलाएं सालों से खेलती आ रही हैं। गाँव की सभी लड़कियां और महिलाएं एक जगह जमा होकर सामा-चकेवा का गीत गाती हैं। सामा-चकेवा के इस सांस्कृतिक और पुरातन खेल में हर उम्र की महिलाएं और लड़कियां सम्मिलित होती हैं। शिवहर सहित सम्पूर्ण बिहार शाम ढलते ही सामा-चकेवा के गीतों से गुलजार हो जाता है।
सामा-चकेवा भाई बहन के प्रेम को प्रदर्शित करने वाला त्यौहार तो है ही इसका पर्यावरण से भी गहरा सम्बन्ध है। यह लोकपर्व छठ के दिन से शुरू होता है और कार्तिक पूर्णिमा तक मनाया जाता है। शाम ढलते ही बहनें डाला में सामा-चकेवा को सजा कर सार्वजानिक स्थानों पर गीत गाती हैं। सामा चकेवा अइह हे…! वृंदावन में आग लगले…! सामा चकेवा खेल गेलीए हे बहिना… आदि गीतों द्वारा हंसी -ठिठोली करती बहनों को देखकर आँखें बरबस ही इस लोकपर्व की सौन्दर्यता से चमक उठती हैं। कहा जाता है की सामा भगवान कृष्ण की पुत्री थी। सामा को घूमने-फिरने में बहुत आनंद आता था। उनके इस घूमने फिरने की शिकायत भगवान कृष्ण से चुगला करता था इसीलिए महिलाएं चुगला के मुंह को जलाती हैं। धार्मिक पुस्तकों में वर्णित कहानियों के अनुसार चुगला ने भगवान कृष्ण से सामा की शिकायत की थी कि वह गलत कार्य करती है। इससे क्रुद्ध होकर कृष्ण ने सामा को चिड़िया बना दिया। लेकिन भाई चकेवा के बलिदान और प्रेम से वह पुनः मानव शरीर प्राप्त करने में सफल रही।
सामा चकेवा के पीछे कि कहानी और इसे मनाने के तरीके कि जानकारी के लिए हम धोबाही गाँव के नेहा कुमारी, शालिनी कुमारी, अर्चना कुमारी सहित दर्जनों लड़कियों और महिलाओं से मिले। पूछने पर उन्होंने बताया कि वो अपने भाई के लंबी उम्र कि कामना के लिए सामा-चकेवा खेलती हैं। हम ने कुछ ग्रामीणों से पूछा कि लड़कियां कब से सामा-चकेवा मनाती हैं तो गौतम कुमार गुप्ता नाम के युवक ने बताया कि यहाँ वर्षों से सामा चकेवा मनाया जाता है। छठ पूजा के समाप्ति के बाद शाम होते ही सारी बहनें अपने अपने घरों से दिया और डाला लेकर आती हैं और कहीं एक जगह बैठ कर सामा का गीत गाती हैं।

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