29 मई, 2017
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कुम्हार काका की ‘दीया-बाती’ और कहां आ गए हम !

आओ फिर से दीया जलाएं....कुम्हार काका के हुनर को फिर से जगमगाएं

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अमित सिंह

बात बचपन के दीया-बाती के त्योहार की। दीपावली को हम दीया-बाती का त्योहार भी कहा करते थे। दरअसल बचपन के उन दिनों में हर त्योहार के साथ कुम्हार का रिश्ता जुड़ा होता था। हर छोटे-बड़े त्यौहार के समय कुम्हार हमारे घर आया करता था और मिट्टी का दीया और मिट्टी से बने बर्तन पहुंचाया करता था। मेरी दादी उस कुम्हार को इस सबके बदले में गेहूं, चावल, धान दिया करती थी। बात उन दिनों की है जब पैसों का इतना प्रचलन नहीं था और जरूरत के मुताबिक पैसों से ही लोगों का काम चल जाया करता था। वक्त बदला और बदलने लगा कुम्हार के मिट्टी के बर्तनों का रंग…अब कुम्हार अनाज के बदले पैसे लेने लगे थे।

दिवाली के समय छोटे से बड़े सभी मोहल्ले के बच्चो में एक दूसरे से ज्यादा दिए जलाने की होड़ लगी रहती थी। मै भी उस होड़ में शामिल हुआ करता था, दादी से मीठी मीठी बाते करके ज्यादा से ज्यादा दिये मंगवाया करता था। मिट्टी के दिए के कारोबार में कुम्हार परिवार के छोटे-बड़े सभी सदस्य दिन-रात एक कर काम करते होते थे।

लकिन समय की मार का असर पर्व-त्योहारों पर भी पड़ा है। लोगों की आदतें बदली और इसके साथ ही रोजमर्रा के उपयोग के सामान भी बदलते चले गए। बदलाव का असर देखना हो तो किसी कुम्हार परिवार को देखिए… कई पीढ़ियों से मिट्टी से बने वस्तुएं बेचकर अपने पुरे परिवार का पेट पालने वाले हमारे गांव के दुलारे पंडित कहते हैं की महंगाई की मार से मिट्टी भी अछूती नहीं रही, कच्चा माल भी महंगा हो गया है। दिन रात मेहनत के बाद हमें मजदूरी के रुप में सौ से ढेढ़ सौ रुपये की कमाई हो पाती है। इससे परिवार का गुजारा नहीं हो पाता है।

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कुम्हार जाती मिटटी का बर्तन, दिया और मूर्ति बनाने का व्यवसाय सदियों से करती आ रही है। लेकिन बदलती जीवन शैली और आधुनिक परिवेश में मिट्टी को आकार देने वाला कुम्हार आज उपेक्षा का दंश झेल रहा है और अपना परम्परागत हुनर और व्यवसाय छोड़ने पर मजबूर हो रहा हैं। स्वावलंबन छोड़ दुसरी जगह मजदूरी करने जाने को विवश हो रहे है। बाजार में मोमबत्ती के आने के बाद मिट्टी के दीपक की रोशनी फीकी पड़ गई। और तो और जबसे मिट्टी के दिये की जगह चायनीज झालर और मिट्टी के भगवान के जगह चायना की मूर्ति आने लगी है, तब से इनकी जिन्दगी के दियाा भी मानो बस इस आस में टिमटिमा रही है कि कभी तो पुराना दौर वापस आएगा। मिट्टी के दिए का महत्व कभी तो लोगों की समझ में आएगा !

मुझे तो ऐसा ही लग रहा है की हम आधुनिकता के दौर में इतने आगे बढ़ चुके हैं की मिटटी के बने दीपक, बर्तन और भगवान की मूर्ति आदि का इस्तेमाल करना अपने शान के खिलाफ समझने लगे हैं। इसी वजह से मुझे लगता है की आने वाले समय यह हुनर ही न ख़त्म हो जाये। हम सभी को इस समृद्ध कला और लाखो लोगों को रोजगार देने वाले इस व्यवसाय को बचाने के लिए पहल करना चाहिए। हमें इस दीपावली मिट्टी से बने बर्तन, दीपक आदि का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल कर इस कला को बचाने का संकल्प लेना चाहिए। शायद एक छोटे प्रयास से एक कला को हमलोग जीवंत रख सकते है… इसी आस में शुभ दीपावली की शुभकामनाओं के संग मै अमित सिंह।

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