23 अगस्त, 2017
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मधुबनी : रहने को घर नहीं, पेट में दाना नहीं, तन पर कपड़ा नहीं !

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अभिषेक कुमार झा की रिपोर्ट

अभी भी मधुबनी जिले में एक ऐसा गांव हैं जहां सरकार की दी हुई कोेई भी सुविधा नहीं मिल रही है

मधुबनी, 26 जून। एक तरफ एसएफसी के गोदामों में आनाज सड़ रहा है तो दूसरी ओर लोग भूख और कुपोषन के शिकार हो रहे है। दुर्भाग्य है आजाद भारत के ये नागरिक के तन पर ना पूरे कपड़े है और ना रहने के आशियाने। दलित महादलित के नाम पर राजनीति करने वाले के पास धन का कुबेर है और इस गाँव के 150 घरों कि महादलित बस्ती को ना तो भारत कि नागरिकता प्राप्त है और ना ही दो वक्त कि रोटी ना ही बदन पर कपड़े और ना हि रहने के लिये छत नजर आते है। आज भी लोग भूखे ,नंगे बदन और डर सेे मर मर कर जीने को पर मजबूर हैं। जब इन्हें सड़कों पर से खदेड़ने की बात कही जाती है तो डर के मारे दुबक जाते हैं। । कोशी नदी की चपेट में आने के कारण यह पूरा गाँव 37 वर्षों से विस्थापित होकर जीवन बसर कर रहे हैं।

मधुबनी जिले के मधेपुर प्रखंड का द्वालख गाँव के कोशी नदी के पेट में बसे 498 गाँवों में से एक हैं। कोशी नदी अपने उफान में गांव के कई भाग को साथ बहा ले गई। इन्ही भागों में से एक हैं भूमि मुसहरी गाँव…. महादलित समुदाय के इस गाँव की आबादी हजारों में हैं। मजबूरी की मार देखिए…आशियाना उजड़ जाने के बाद बस्ती के लोग भागकर सड़कों पर आ बसे हैं। बताया जा रहा है कि किसी जमींदार के निजी जमीन पर झोपडी बनाकर रहने लगे हैं। गाँव का यह हिस्सा लगभग 37 वर्षों से विस्थापितों का रैनबसेरा बना हुआ है। रैनबसेरा इसलिये क्योंकि सरकारी सुविधा के नाम पर ना तो इन्हें नागरिकता है और ना ही राशन कार्ड। ऐसा नही है कि इनलोगों को कभी राशन कार्ड नही मिला। एक बार मुखिया जी ने इनलोगों को राशन कार्ड उपलब्ध कराया भी पर उसे कुछ दिनो बाद सीमा विवाद कि बात कह कर रिजेक्ट कर दिया गया। इनका हक कौन दिलायेगा। क्या कोई नेता इस दायरे में आयेगा। कई सवालों को जेहन में लेकर ये ग्रामीण कहते हैं कि आज तक हमलोगों को कोई लाभ नहीं मिला। ना तो सरकार ने कुछ दिया और ना ही किसी और ने। जमीन मालिक बार बार घर को उजाड़ कर भगाने कि बात करती है। लेकिन हम कहाँ जाये हम तो भूख से मर रहे है हमारे लिए जमीन का इंतजाम कौन करेगा।

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ये कहानी केवल द्वालख गांव का नहीं है कूछ ऐसा ही दास्तां बाबूबरही प्रखंड के भट्गामा गाँव की भी है। 12-13 साल तक के किसी बच्चे के बदन पर पूरे कपड़े नहीं नजर आये। यहाँ तक की लड़कियों के बदन पर भी पूरे कपड़े नहीं है। बच्चे कुपोषित हांडी में सीधा हाथ घुसा कर खिचरी खाते हैं। गंदगी से भरे इस गाँव में सिर्फ झोपड़िया ही झोपड़िया है। सबसे बड़ी बात तो यह है इस बस्ती को आज तक मान्यता नहीं मिला है। ग्रामीण कहते है आज तक सरकारी लाभ के नाम पर कुछ नहीं मिला हर रोज एक डर बना रहता है जमीन मालिक कि रोजाना गालियाँ सुननी पड़ती है। कई बार मौत पर मातम मनाने तो नेताओं का काफिला पहुंचता है लेकिन जिंदा लोगों को कोई देखने वाला नहीं है।

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