04, Dec, 2016
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मैथिलि साहित्य की नयी विधा बिहनी में लिखित “उपरांत” का विमोचन

jhanjharpur

सरफराज सिद्दीकी की रिपोर्ट

झंझारपुर कथा लेखन की नई विधा बीहनि को भारतीय साहित्य इतिहास में सिर्फ मैथिली साहित्य ने ही अपनाया है। इस विल़क्षण विधा में लिखित “उपरांत“ पुस्तक का विमोचन साहित्यांङ्गन के दसवें कीर्ति कुम्भ में किया गया। इस पुस्तक के रचनाकार घनश्याम घनेरो ने कहा कि लघु कथा की छोटकी सहोदरी को हम बीहनि की संज्ञा देते हैं। जो आता है और बड़ा संवाद छोड़कर चला जाता है। श्री घनेरो ने कहा कि महज आठ दस पूस्तकें हीं इस विधा में प्रकाशित हो सकी हैं।लेकिन इस विधा ने अपना स्थान मैथिली भाषा साहित्य में पक्का कर लिया है। दो दशकों के लम्बे संघर्ष ने बीहनि कथा को यहाँ तक पहुँचाया है। बता दें कि दिल्ली के ग्लोबल लिटरेचर क्लब आफ इंडिया ने चार क्षेत्र में मैथिली रचनाकारों को सम्मानित करने की घोषणा की है। उनमे बीहनि कथा लेखन के लिए घनश्याम घनेरो को भी सम्मान के लिए चुना गया है। साहित्याङ्गन के संस्थापक अध्यक्ष मलय नाथ मण्डन ने कहा कि कि यह संयोग ही है कि बीहनि कथा गोष्ठी के संयोजन का मौका दो दशक बाद ही सही मगर से अवसर उन्हे ही मिला है। श्री मंडन ने कहा कि दो दशक के ईतिहास मे बीहनि ने कई तरह के उतार चढाव देखे हैं। इस विधा को नाम देने वाले साहित्यकार श्रीराज और इस बाबत लगातार संघर्ष करने वाले मनोज कुमार कर्ण मुन्नाजी बधाइ के पात्र हैं। गोष्ठी मे अध्यक्षता कर रहे डॉ. खुशीलाल झा, प्रो. ईशनाथ झा, धर्मनाथ झा, सहदेब झा, अजित आजाद, अमर नाथ झा, आनन्द मोहन झा, नारायण झा , डा. रामसेवक झा ,ने भी मैथिली के इस विधा पर वक्तव्य देते हुए कहा कि आज संस्थाएँ सम्मान प्रदान करने लगी हैं।

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