05, Dec, 2016
ब्रेकिंग न्यूज़

NEWS OF BIHAR

शहीद की पत्नी के सवाल…अब जवाब दे पीएम, पब्लिक और पत्रकार ! विजय देव की Exclusive रिपोर्ट

fgjgh

वरिष्ठ पत्रकार विजय देव झा के फेसबुक वॉल से साभार

22 सितम्बर। किसी शहीद की विधवा से सवाल पूछना उतना ही कठिन होता है जितनी आसानी से हम सत्ता संस्थान पर तेज़ी से सवाल दागते हैं। उरी हमले के शहीद नयमन तिग्गा की विधवा वीणा से चंद सवाल करने से पहले मैं दो घण्टे तक साहस बटोरता रहा की उसे अपने पति के मृत्यु की जानकारी कब और कैसे मिली। नयमन उन 18 फौजियों में से थे जो उरी में आतंकवादी हमले में मारे गए। मैं अंतरराष्ट्रीय मामले का जानकार होने का कोई दावा नहीं करता हूँ, बीणा भी ऐसा कोई दावा नहीं करती। लेकिन जब शहीद की विधवा अपने विलाप में भीरु से अधिक भद्र मनमोहन सिंह से लेकर महाबलशाली मोदी से बार बार शिकायत करे तो समझिए की आपकी नीति सही दिशा में नहीं जा रही है।

नयमन का तीन साल का बेटा अभिनव इस बात को देखकर परेशान था कि दीवाल पर टँगे उसके फौजी पिता की सारे तस्वीरों को आख़िरकार क्यों उतार लिया गया है, उसकी माँ उसके पिता की तस्वीर को छाती से लगाकर क्यों रो रही है। न उसके किसी चाचा भाई का नाम मनमोहन और मोदी है तो उसकी माँ किसकी बात कर रही है। बहरहाल वह फुटबॉल खेलने में व्यस्त हो गया। 2014 चुनाव के वक़्त अभिनव नवजात था सो उसने हरहर मोदी का नारा नहीं सुना होगा। बीणा और उसके जैसे अन्य फौजियों की पत्नी की तरफ लौटिए। ये आम महिलाओं से अलग धातु की बनी होती हैं क्यों की उन्हें पता होता है कि उनके सुहाग और बैध्वय के बीच एक पतली लकीर है। और वह उस लकीर पर जीती हैं। यह एहसास हिंदुस्तान के उन बुद्धिजीवियों और सियासी लोगों को नहीं है जो ऐसे दुखद क्षण को अपने तरीके से इस्तेमाल करते हैं। नयमन जब इस बार एक महीने के लिए अपने घर आया था उसी वक़्त उसका तबादला उरी में कर दिया गया। वीणा ने मुझे बताया कि वह इस बार नहीं चाहती थी की उसका पति उरी में ज्वाइन करे। क्योंकि काश्मीर के हालात इस बार बेहद खराब थे। बीणा को यह दुःख जीवन भर सालता रहेगा की उसके पति और दूसरों को धोखे से मार दिया गया और वह बिना लड़े और दुश्मन को मारे बिना ही मर गया। उसका वश चले तो वह अपने पति के हत्यारों को तत्काल खत्म कर दे।

शहीद की विधवाओं के ऐसे सवालों का जबाब देना अवाम और सत्ता के वजीरों के लिए काफी कठिन होता है। वह आपके भाड़ी भड़कम जारगन, अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर आपके विशद ज्ञान को झेलने के मूड में कतई नहीं हैं। बीणा के साथ साथ कुछ औरतें भी थी जिनके पति घटना के वक़्त उरी के उस कैम्प में मौजूद थे। वह सरकार के साथ साथ पूरे राजनितिक वर्ग के दशकों से चल रहे ढुलमुल रबैये से नाराज हैं। उनकी नाराजगी इसलिए बढ़ गयी है क्यों की मोदी ने कभी मजबूत लीडर के तौर पर वादा किया था कि वह एक दाँत के बदले पाकिस्तान का पूरा जबड़ा उखाड़ देंगें। अटलबिहारी बाजपेयी से लेकर मनमोहन सिंह मोदी तक कुछ भी नहीं बदला। भारत दशकों से पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी हमले चुपचाप झेल रहा है। बदले में हम कड़े शब्दों में निंदा, अफ़सोस, बदला लेंगें, पाकिस्तान हमारे सहनशक्ति की परीक्षा न ले, बोल कर अगला हमला झेलने की तैयारी करते हैं। तरीके से देखें तो अब तक भारत सरकार को गजट प्रकाशित कर इन शब्दों को सरकारी शब्दावली में शामिल कर लेना चाहिए। शहीदों की शहादत को सलाम कर देना, कंपनसेसन में कुछेक लाख देकर सरकार और सियासी लोग इस बड़े सवाल से बच नहीं सकते।

बीणा को कोई मुआवजा नहीं चाहिए और आप उसके दुःख में दुखी होने का सार्वजनिक ढोंग मत कीजिये। और कभी कभी उनका जबाब आपको ऐसी जगह पटकेगा की आपको भागने के लिए जमीन नहीं मिलेगी। उरी एनकाउंटर में शहीद एक जवान की विधवा ने बिहार सरकार को ऐसा ही जबाब दिया जब सरकार ने शहीदों के परिवार के लिए मुआवजे का ऐलान किया। “मेरे पति किसी नाले में गिरकर या शराब पी कर नहीं मरा है वह देश की रक्षा करते हुए मरा है”, उस शहीद की पत्नी ने यही कहा। सवाल यही है कि आपको पाकिस्तान को सबक सिखाने और आतंकवादियों को जड़मूल से समाप्त करने से किसने रोका है। इस सवाल की चपेट में मोदी और उनकी पार्टी सहित वो सब हैं ज़िन्हें हुर्रियत वालों ने घर से दुत्कार कर भगा दिया, जो कश्मीर के उपद्रवियों पर पैलेट गन इस्तेमाल के मसले को लेकर भारत को अंतर्राष्ट्रीय स्तर बदनाम कर रहे रहे, वो जिन्हें जेएनयू से निकलती भारत विरोधी नारों में संगीत सुनाई दे रहा था, जो आतंकवादियों के मौत को ग्लोरीफाई करते रहे, वो जो चेतावनी भरे लहजे में कहते हैं कि भारत ने पाकिस्तान पर कार्रवाई की तो देश में दंगे फ़ैल जायेंगें, वो जो यह कह कर सत्ता में आये थे की एक राष्ट्रवादी सरकार ही पाकिस्तान को जबाब दे सकती है, वो जो गाल बजाते हैं कि शासन करने का नैसर्गिक गुण और अधिकार सिर्फ उन्हीं का है उनके पास बीणा और उसके जैसे शहीद की पत्नियों के सवाल का कोई जबाब नहीं है। हाँ निर्लज्जता, ढीठपन, लफ़्फ़ाज़ी, झूठ, दोषारोपण जबाव की श्रेणी में नहीं आता है।

हिंदुस्तान का राजनितिक वर्ग एक लंबे समय से एक मानसिक विकलांगता झेल रहा है। जब जब इस वर्ग के सर में दर्द होता है वह पाँव दबाने का हुक्म देती है। भारत के गुस्से की पराकाष्ठा पाकिस्तान से क्रिकेट खेलना बन्द कर देगा। लेकिन तत्काल बाद ही देश के मासूम क्रिकेट प्रेमियों के हित में खेल चालू हो जाता है। भारत अंतर्राष्ट्रीय मंच पर स्थापित और सत्यापित नंगे पाकिस्तान को नंगा करने की कार्रवाई करता है। फिर देश के अंदर प्रबुद्धों का एक वर्ग सांस्कृतिक आदान प्रदान के सहारे अमन शांति पर जोर देता है। यह सब किताबी बातें हैं। भारत ने पंचतंत्र को पढ़ा है जरूर लेकिन कभी उसके अर्थ को नहीं समझा। यह जानते हुए भी की पाकिस्तान की पैदाइश ही नफरत के आधार पर हुई थी एक ऐसा मुल्क जिसने पुरानी और समृद्ध संस्कृति को नष्ट कर आतंकवाद को अपना मजहब बना लिया कुछ बौद्धिक अमन और शांति भौंड़ा दिखावा करते हैं। बीणा ने मुझसे यही सवाल किया। यह जानते हुए। ऐसा नहीं है कि ऐसे हमले सिर्फ बीजेपी के समय में ही हुए। ऐसे हमले कांग्रेस के समय में भी हुए थे। लेकिन पाकिस्तान हमारे लिए इतनी बड़ी चुनौती नहीं है जितना की देश के अंदर विभाजित राजनैतिक और वैचारिक वर्ग। आज मोदी हमला झेल रहे हैं तो कल मनमोहन सिंह ने झेला। ऐसे हमलों के वक़्त हमारा फोकस देश के अंदर अपने राजनैतिक प्रतिद्वंदी होते हैं।

देश में ऐसे लोग और विचारधारा मौजूद हैं जिसका प्रत्यक्ष झुकाव पाकिस्तान की तरफ है। पहले यह छुपे तौर पर होता था अब यह खुलेआम हो रहा है। अगर ऐसा नहीं होता तो मणिशंकर अय्यर पाकिस्तान जाकर मोदी को हटाने की गुहार नहीं करते। डिप्लोमेसी का एक थम्ब रूल है ‘सठम साठ्ये समाचारे’ और जब हिंदुस्तान ने बलूचिस्तान का मुद्दा उठाकर पाकिस्तान को घेरने की कोशिश की तब देश के अंदर ही कईयों के भीषण पेट दर्द की शिकायत हुई थी उसमें से एक थे सलमान खुर्शीद। कांग्रेस ने आज तक उनसे यह नहीं पूछा और ना ही देश में ऐसे नेताओं और इंटरेस्ट ग्रुप ने यह सवाल किया की अगर पाकिस्तान काश्मीर का मुद्दा उठा सकता है तो भारत क्यों नहीं. मोदी से यह देश 2019 क्या उससे पहले भी निबट ले सकता है। मोदी हमारी पहली चुनौती नहीं है हमारी पहली चुनौती पाकिस्तान है। देश के लोगों को अपनी सरकारों से कतई यह उम्मीद नहीं लगानी चाहिए की वह इंदिरा गांधी किधर है पाकिस्तान घुटने पर ले आएगी जहां देश के अंदर ही पाकिस्तान और आतंकवादियों के बचाव के लिए तलवारे निकल आती हैं। आज वह लोग मोदी से लड़ाई की तारीख पूछ रहे हैं जो कल तक पाकिस्तान का बचाव कर रहे थे।

कल जिसने छप्पन इंच के सीने का हौवा खड़ा किया था आज उनके लिए जबाब देने का वक़्त है। पाकिस्तान यूँ ही ढीठ नहीं बना हुआ है उसे पता है कि भारत अब लाल बहादुर शास्त्री का मुल्क नहीं रह गया है जिनके एक आवाह्न पर देश ने एक वक्त का खाना छोड़ दिया था। लड़ाई होगी तो महंगाई बढ़ेगी बहुत कुछ होगा। सरकार पर पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए भले दबाव हो क्या भारत एक और लड़ाई मोल ले सकता है जहाँ लोग प्याज और दाल के सवाल पर सरकार गिरा देते हों। पाकिस्तान को पता है कि अब न इंदिरा गाँधी हैं न अटल बिहारी बाजपेयी जो इंदिरा गाँधी के लिए 1971 की लड़ाई के दौरान पूरे विश्व में समर्थन जुटाते रहे। हम पीबी नरसिम्हाराव और अटल बिहारी बाजपेयी के मूल्यों से काफी आगे बढ़ चुके हैं। कभी अटल बिहारी ने अपने साशनकाल के दौरान किये गए सफल परमाणु परीक्षण का श्रेय नरसिम्हाराव को दिया था। भारत ऋषि मुनियों का देश रहा है सो स्वभावतः सन्त प्रवित्ति का है और यह देश अब तक शायद इन्हीं पुण्यात्माओं के पुण्य कर्म की वजह से बचा हुआ है। लेकिन जब पुण्य का खजाना खत्म हो जाएगा उसके बाद क्या?

newsofbihar.com की ख़बरें अपने न्यूज़फीड में पढ़ने के लिए पेज like करें  

 
 

newsofbihar.com की ख़बरें अपने न्यूज़फीड में पढ़ने के लिए पेज like करें

newsofbihar

2 विचार साझा हुआ “शहीद की पत्नी के सवाल…अब जवाब दे पीएम, पब्लिक और पत्रकार ! विजय देव की Exclusive रिपोर्ट” पर

  1. रुपचन्द्र झा कन्हैई September 22, 2016

    भारत इस समय उस स्थिति में पहुँच गया है कि वो अब एक और युद्ध नहीं झेल सकता क्यौकि ऐसा करने से समुचे विश्व में महाशक्ति की ओर अग्रसर हो रहे उसका बढता कदम रुक जायेगा पर भारत तो शहादत भी नहीं भूलनी चाहिये ऐसे में उसे अपने दोस्त अमरिका से सीख लेनी होगी जिसने लादेन को नर्किस्तान(पाकिस्तान) में घुसकर मार दिया ,भारत को भी आतंकी हाफिज सईद जैसो के लिये ऐसा ही करना चाहिये |

  2. Sham September 28, 2016

    Good story

अपने विचार साझा करें

आवश्यक लिखें चिह्नित:*

Powered By Indic IME