22 अगस्त, 2017
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भक्तों की मदद के लिए बाबा बैद्यनाथ का चेक ? इस चमत्कार का प्रमाण मौजूद है…

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हरि अनंत, हरि-कथा अनंता की उक्ति को चरितार्थ करते हुए द्वादश ज्योर्तिलिंग बाबा वैद्यनाथ की महिमा अपरंपार है। औघड़दानी भोले शंकर किस रूप में और किस विधि से अपने भक्तों पर प्रसन्न होंगे। ये कोई नहीं जानता। किंतु इतना निश्चित है कि निर्मल हृदय से की गई पूजा को देवाधिदेव सहज रूप से स्वीकारते है। तभी तो श्रवण मास में बाबा भोले को प्रसन्न करने के लिये बड़ी संख्या में शिव भक्तों का हुजूम सुल्तानगंज की उत्तरवाहिनी गंगा का पवित्र जल लेकर देवघर की ओर कूच करता है। कोई साधनायुक्त भक्तिपूर्वक कांवर लेकर बोलबम-बोलबम की रट लगाते हुए तीन-चार दिनों में बाबा धाम पहुचंता है, तो डाक बम लगातार दौड़ लगाते हुए जल उठाने के बाद दौड़ते हुए 24 घंटे के अंदर ही शिव-धाम पहुंच जाता है। कोई पूरी कांवर-यात्रा में बिना कहीं बैठे खड़ा बम बनकर चलता है, तो कोई पूरे रास्ते अपार कष्ट सहते हुए दंडवत करते धड़प-निया देते हुए दांडी बम बनकर जाता है। भगवान भोले शंकर भी विभिन्न विधियों से अपने श्रद्वालुओं पर कृपा-आशीर्वाद अनुकंपा बरसाते हैं जो कभी-कभी अकल्पनीय भी लगता है।

बाबा की कृपा की एक ऐसे ही अनूठे दृष्टांत का उल्लेख संताल परगना के 1910 के गजेटियर में किया गया है जिसमें बाबा वैद्यनाथ के द्वारा अपने जरूरतमंद भक्तों के नाम हुंडी जारी करने की बात कही गयी है वो भी पीपल के पत्ते पर जिसकी मान्यता पूरी दुनिया में थी। जिसके भी नाम से ये हुंडी जारी होती थी, वो तुरंत धारक को उसमें लिखित राशि का भुगतान कर देता था और ऐसा करके अपने आपको धन्य और बाबा का कृपा-पात्र समझता था। आज से 104 वर्ष पूर्व 1910 में प्रकाशित संताल परगना गजेटियर में सन् 1695 से 1699 के बीच लिखित उर्दू पुस्तक खुलासतू-त-तवारीख का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि मुंगेर जिला की पहाड़ की वादियों में बैजनाथ (वैद्यनाथ)नामक स्थान है जो महादेव का पवित्र स्थल है। यहां एक चमत्कारिक घटना होती है, जो उन लोगों को अचंभे में डाल देती है जो बातों को सिर्फ बाहरी नजरिया से देखते है। वाकया इस तरह है कि इस मंदिर में एक पीपल का पेड़ है, जिसके बारे में कोई नहीं जानता है कि यह कब से खड़ा है। उन दिनों मंदिर में किसी श्रद्धालु को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पैसे की घोर आवश्यकता पड़ती थी पर उसे कोई रास्ता नहीं मिलता था, तो वह अन्न- जल त्याग कर मंदिर प्रांगण में स्थित इस पीपल के पेड़ के नीचे बैठ जाता था और अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिये महादेव की प्रार्थना में लीन हो जाता था। भक्तों की भक्ति का असर होने पर दो या तीन दिनों के बाद उस पीपल के वृक्ष से एक पत्ता गिरता था जिस पर किसी अदृश्य कलम से देवनागरी से मिलती – जुलती लिपि में आदेश को रूप में कुछ पंक्तियां लिखी होती थी। यह आदेश दुनिया को किसी भी व्यक्ति के नाम लिखा हो सकता था जिसमें यह अंकित रहता था कि उसके धारक भक्त को इतनी राशि का भुगतान कर दो। चाहे उस व्यक्ति का घर बैद्यनाथ धाम से 500 कोस दूर ही क्यों न हो, पीपल को उस पत्ते पर संबंधित व्यक्ति का तथा उसके बच्चों, पिता, पुत्र और दादा का नाम स्पष्ट रूप से लिखे होते थे। मंदिर के प्रधान पुजारी उस पीपले के पत्ते पर विवरण को बाबा का आदेश मानते हुए उसे एक अलग कागज पर लिखकर धरनार्थी भक्त को दे देते थे यह कागज बैद्यनाथ की हुंडी चेक कहलाती थी। भक्त इस हुंडी चेक को लेकर उसपर अंकित निर्देशों के अनुसार उस व्यक्ति के पास चला जाता था जिसके नाम यह लिखा होता था। और वह व्यक्ति बिना किसी ङिाझक या टाल-मटोल के सहर्ष उसमें अंकित राशि का भुगतान इसके धारक को कर देता था। उस पुस्तक के लेखक ने यह भी उल्लेख किया है कि एक बार यह ब्राह्मण इसी तरह की बैजनाथ की हुंडी लेकर उनके पास आया था तथा उन्होंने इसे बाबा की कृपा का शुभ संकेत समझकर अंकित पूरी राशि का भुगतान कर दिया था व उसे सभी तरह से संतुष्ट करके वापस भेजा था। उसी पुस्तक में यह भी उल्लेख है कि इस धार्मिक स्थान में एक गुफा थी जिसके संकट मंदिर के प्रधान पुजारी वर्ष में एक बार शिव-व्रत के दिन प्रवेश कर उसमें से कुछ मिट्टी निकालकर लाते थे जो बाबा की शक्ति से प्रत्येक व्यक्ति की भक्ति के अनुसार उतने बड़े सोने के टुकड़े में बदल जाता था। उर्दू पुस्तक खुलासतू-त-तवा रीख -1695-99 के ये उद्धारण बाबा की शक्ति और भक्तों के प्रति उनकी अगाध कृपा के निरल उदाहरण हैं।

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