05, Dec, 2016
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मिरानिसे की महारैली में तय होगा अगला ‘महारथी’ !

sharat-jha

दरभंगा, 7 नवंबर। बिहार से अलग मिथिला राज्य बनाने की मांग आज से नहीं बल्कि पिछले कई दशकों से चली आ रही है। मिथिला राज्य निर्माण सेना नामकी संस्था ने मिथिला राज्य की मांग को लेकर शंखनाद कर दिया है। पिछले करीब दो महीने से मिरानिसे के कार्यकर्ता दो दिवसीय महारैली को कामयाब बनाने के लिए अथक प्रयास में जुटे थे। मिरानिसे की महारैली कल यानि 8 नवंबर और 9 नवंबर को दरभंगा के संस्कृत विश्वविद्यालय के सभागार में होनी है। खास बात ये है कि इस महारैली को सफल बनाने के लिए पहली बार कई अनूठे प्रयोग देखने को मिले। मिरानिसे के जनसंपर्क अभियान की बागडोर जहां दरभंगा, मधुबनी, सहरसा, भागलपुर में राष्ट्रीय महासचिव राजेश झा और प्रदेश अध्यक्ष रंगनाथ ठाकुर ने संभाल रखी थी वहीं दिल्ली में भी मिरानिसे के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री शरत झा ने सघन जनसंपर्क अभियान चलाया। मिरानिसे का जनसंपर्क रथयात्रा भी मीडिया की सुर्खियों में बना रहा। दरभंगा में मिरानिसे महारैली को लेकर बड़े-बड़े होर्डिग्स आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। महारैली में शामिल होने के लिए बिहार के कई जिलों के प्रतिनिधि समेत दिल्ली, मुंबई, गुवाहाटी, कोलकाता, कानपुर से भी मिरानिसे के कार्यकर्ता जुट रहे हैं। महारैली को सफल बनाने के लिए रणनीति कुछ इस तरह की बनाई गई है कि छठ के मौके पर भारी तादाद में अप्रवासी मैथिल जुटते हैं और इसके साथ-साथ वो मिथिला राज्य की मांग को लेकर महारैली में भी शामिल हो जाएं।

हम आपको बता दें कि स्थापना के बाद मिरानिसे के कार्यकर्ताओं ने तीन रथयात्रा भी की थी। इसके अलावा मिथिला हित से जुड़े सभी मुद्दों पर मिरानिसे के कार्यकर्ता जोरदार प्रदर्शन करते रहे। यही वजह है कि मिरानिसे ने मैथिल जनमानस के बीच अपनी पैठ बना ली। लेकिन जैसा कि आमतौर पर कई मैथिल संस्थाओं में देखने को मिलता रहा है वो इस संस्था के साथ भी हुआ और आपसी मनमुटाव और राजनीतिक महत्वाकांक्षा का शिकार इस संस्था को भी होना पड़ा। मिरानिसे के सक्रिय कार्यकर्ताओं ने कुछ वरिष्ठ अधिकारियों पर मनमानी करने का आरोप लगाते हुए संस्था से मुंह मोड़ लिया और फिर धीरे-धीरे इस संस्था की गतिविधि शिथिल पड़ गई। लेकिन तकरीबन दो साल बाद एक बार फिर से मिरानिसे को पुनर्जीवन देने के लिए ये महारैली संजीवनी का काम कर सकती है। मिरानिसे के कुछ सक्रिय कार्यकर्ताओं ने पटना में बैठक का आह्वान किया और उसके बाद मिथिला हित में सभी सदस्यों ने एक साथ मिलकर काम करने का शपथ लिया। और फिर तय किया गया कि दरभंगा में दो दिन की महारैली का आयोजन किया जाय और मैथिल जनमानस के बीच अलग राज्य की मांग को पुरजोर तरीके से उठाया जाय।

कार्यक्रम के स्वरूप के मुताबिक 8 नवंबर को कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय के सभागार में अगले कार्यसमिति का चुनाव होना है। माना जा रहा है कि कार्यसमिति की इस बैठक में मिरानिसे के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष का भी ऐलान किया जा सकता है। सूत्रों की माने तो राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए जिन दो नामों पर सबसे अधिक चर्चा चल रही है वो हैं शरत झा और रंगनाथ ठाकुर।

1. रंगनाथ ठाकुर- वर्तमान में मिरानिसे के प्रदेश अध्यक्ष हैं और दरभंगा बीजेपी के कद्दावर नेताओं में से एक हैं। हालांकि रंगनाथ ठाकुर इस बार जाले विधानसभा सीट से बीजेपी का टिकट चाह रहे थे लेकिन पार्टी ने उनको मौका नहीं दिया। रंगनाथ ठाकुर इसके बाद से पार्टी से नाराज चल रहे हैं। रंगनाथ ठाकुर प्रखंड प्रमुख भी रह चुके हैं। रंगनाथ ठाकुर के साथ पॉजिटिव बात ये है कि दरभंगा में रहते हैं और मिरानिसे का एक धड़ा खुलकर उनकी वकालत भी कर रहा है। लेकिन नकारात्मक पक्ष ये है कि बुजुर्ग होने की वजह से वो शायद युवावर्ग की पसंद नहीं बन पाए। हालांकि रंगनाथ ठाकुर के समर्थकों का ये भी कहना है कि वो अनुभवी हैं और संगठन की राजनीति में उनके अनुभव से मिरानिसे को लाभ मिल सकता है लेकिन विरोधी गुट का कहना है कि मिथिला राज्य की मांग को लेकर आंदोलन में कोई युवा नेतृत्व पूरी मजबूती के साथ सशक्त तरीके से काम कर सकता है।

2. अब बात शरत झा की- शरत झा पेशे से इंजीनियर हैं और कई मल्टीनेशनल कंपनी में काम कर चुके हैं। शरत झा अब खुद की पहचान एक कारोबारी के तौर पर बना रहे हैं। दिल्ली-एनसीआर में मैथिल आंदोलनकारी के तौर पर उनकी अच्छी खासी पहचान है। गाजियाबाद भाजपा में महासचिव के पद पर शरत झा युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। शरत झा के समर्थन में सोशल मीडिया पर भी युवा वर्ग मुहिम चला रहा है। मैथिली पर अच्छी पकड़ रखने वाले शरत झा कि कविताओं को काफी सराहना मिली है। वहीं शरत झा के विरोधी खेमे का ये कहना है कि चूंकि वो मिथिला में नहीं रहते हैं इसलिए वो इस आंदोलन को धार नहीं दे सकते हैं लेकिन इसके बारे में शरत झा का कहना है कि अब चूंकि मैं नौकरी पेशे में नहीं हूं और अपने काम-काज को बिहार में भी पसार रहा हूं तो जहां तक बात आंदोलन को समय देने की है तो मैं फुलटाइमर आंदोलनकारी के तौर पर भी काम करने में सक्षम हूं।

हालांकि ऐसा भी माना जा रहा है कि मुमकिन हो कि कोई नया चेहरा ही राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर उभर कर सामने आ जाए। हालांकि हम आपको बता दें कि ऐसा नहीं है कि मिरानिसे में सबकुछ ठीक ही चल रहा है। सोशल मीडिया पर मिरानिसे के वर्तमान अध्यक्ष श्याम झा ने कुछ अधिकारियों की कार्यशैली को लेकर खुलकर एतराज जताया था वहीं दूसरी ओर मिरानिसे से जुड़े संजय कुमार रिक्थ ने भी अपनी नाराजगी जाहिर की थी। खैर, मिरानिसे के अधिकारी दावा तो कर रहे हैं कि संस्था में जो थोड़ी-बहुत शिकवा शिकायत है उसको दूर कर लिया जाएगा लेकिन मिरानिसे को पूर्व की घटनाओं से सबक लेते हुए अब फूंक-फूंक कर कदम उठाना चाहिए और कम से कम अब इस संस्था को अति महत्वाकांक्षा का शिकार होने से बचाने की पूरी कोशिस करनी चाहिए ताकि मैथिल जनमानस का भरोसा दोबारा जीत सकें। एक सर्वे के मुताबिक मिथिला के आम लोग अलग राज्य बनाने की मांग का समर्थन तो करते हैं लेकिन मैथिल संस्था और उनके कर्ता-धर्ता अब तक आम लोगों का भरोसा जीतने में नाकाम रहे हैं।

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