23 अगस्त, 2017
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बख्तियार खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय को जलाया था : हम ‘खिलजी’ से कम हैं क्या ?

Nalanda

वरिष्ठ पत्रकार शिवनाथ झा की रिपोर्ट
#91-9810246536
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वैसे बिहार स्थित नालन्दा विश्वविद्यालय का पूर्णतः अवसान १३ वीं सदी में हो गया था और ११९९ में​ तुर्क आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ​ने इसे जला कर पूर्णतः नष्ट कर ​दिया। परन्तु यदि इसके अवशेषों के रख-रखाव को देखें तो आज भी सैकड़ों खिलजी हैं जो ‘स्वहित के लिए’ इस महाविहार के भग्नावशेषों का सम्पूर्ण रख-रखाव करने में पूर्णतः असफल दिखते है। उनकी उपेक्षा के शिकार के कारण भग्नावशेषों का एक बड़ा भाग अवसान की ओर उन्मुख है। यह अलग बात है कि भारत सरकार से साथ-साथ विश्व के अन्य देश में इसके समुचित रख-रखाव के लिए पर्याप्त राशि मुहैय्या करते हैं। ​

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नालन्दा विश्वविद्यालय अपने प्रवेश द्वार से ३०० कदम बाद विश्वविद्यालय का भग्नावशेष अपने ​औकात में दीखता है। यह अलग बात है कि नालंदा महाविहार​ को पिछले दिनों यूनेस्को ने विश्व धरोहर की सूची में शामिल किया है।

भग्नावशेष परिसर में प्रवेश के साथ बायीं ओर स्थित मन्दिर, जिसके परिसर में प्रवेश पर पाबन्दी है, के साथ दो सौ कदम क्षेत्र में स्थित भग्नावशेष तो पर्यटकों को आकर्षित करता है; परन्तु उसके बाद दाहिनी ओर स्थित सभी भग्नावशेष अपनी किस्मत पर रोती-बिलखती दिखती है। लगभग सभी भग्नावशेषों पर, परिसरों में जंगली पेड़-पौधों का साम्राज्य है। इतना ही नहीं, पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था के वाबजूद, स्थानीय लैला-मजनुओं के लिए यह स्थान दिल्ली स्थित पुरातत्वों की तरह “प्यार का इजहार” करने के लिए उपयुक्त स्थान हो गया है।

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स्थानीय देख-रेख करने वालों, विशेषकर गाईडों का कहना है कि सौ में नब्बे फीसदी पर्यटक मुख्य मंदिर और इसके आस-पास के दो सौ कदम से अधिक नहीं घूमते, भग्नावशेषों को नहीं देखते। शायद यही कारण होगा कि अन्य भग्नावशेष के रख-रखाव पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता हो। हाँ, परिसर के सौंदर्यीकरण में कोई कोताही नहीं बरता गया है।

विश्वविद्यालय परिसर में प्रवेश साथ दाहिनी और वायीं ओर सुन्दर उद्यान बने है। पर्यटकों की सुविधा और आकर्षण के लिए सुन्दर पथ बने हैं। पथ के दोनों तरफ पौधों के सुन्दर हेज बने हैं। लेकिन भग्नावशेषों वाले क्षेत्र में प्रवेश के साथ दाहिनी ओर स्थित सभी भग्नावशेष उपेक्षित दिखाई देते हैं, जिस पर जंगली पेड़-पौधों का साम्राज्य है।
​पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र के शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन यानी यूनेस्को की वैश्विक विरासत समिति ने तुर्की की राजधानी इस्तांबुल में अपनी 40वीं बैठक में ‘नालंदा महाविहार के भग्नावशेष’ को अपनी विश्व धरोहर सूची में शामिल करने का फैसला किया ।

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यूनेस्को के इस फैसले के साथ ही विश्व के इस प्राचीन ज्ञानकेंद्र की पहचान अंतरराष्ट्रीय फलक पर और मजबूती के साथ दर्ज हो गई है। ​वैसे बिहार ही नहीं, भारत के लोग कहते हैं की ​नालंदा महाविहार के भग्नावशेष को विश्व धरोहर में शामिल किया जाना बिहार और देश दोनों के लिए गर्व की बात है​, परन्तु भग्नावशेषों के रख-रखाव को देखकर उनकी मानसिकता भी दिखती है ​।

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​कहा जाता है कि ​नालंदा महाविहार के भग्नावशेष को विश्व धरोहर में शामिल करने के लिए आर्किलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) ने यूनेस्को को 400 पेज की लंबी रिपोर्ट भेजी थी। इस रिपोर्ट में नालंदा विश्वविद्यालय का पूरा इतिहास, महत्व और स्थल की विस्तृत जानकारी दी गई थी।

​सन 2015 के अगस्त महीने में यूनेस्को की एक टीम बिहार पहुंची और उसने यहां इस स्थल के पुरातात्विक और ऐतिहासिक स्थलों का जायजा करने के बाद अपनी रिपोर्ट तैयार की। एक साल बाद नालंदा महाविहार के भग्नावशेष विश्व धरोहर की सूची में शामिल ​किया गया।

नालंदा महाविहार के भग्नावशेष, विश्व धरोहर में शामिल होने वाला बिहार का दूसरा ऐतिहासिक व सांस्कृतिक महत्व का स्थल है। इससे पहले यूनेस्को, राज्य के महाबोधि मंदिर को भी विश्व विरासत सूची में शामिल कर चुका है।
पुरातात्विक और साहित्यिक साक्ष्यों के आधार पर माना जाता है कि नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना 413 ईस्वी में गुप्त वंश के शासक कुमार गुप्त ने की थी।
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इनके बाद हर्षवर्धन और पाल शासकों ने भी इस विश्वविद्यालय के विकास में अपना पूरा योगदान दिया। सम्राट अशोक और हर्षवर्धन ने यहां सबसे ज्यादा मठ, विहार तथा मंदिर बनवाए। 780 साल तक यह स्थल बौद्ध धर्म, दर्शन, चिकित्सा, गणित, वास्तु, धातु और अतंरिक्ष विज्ञान के अध्ययन का विश्व प्रसिद्ध केंद्र रहा। शून्यता का सिद्धांत देने वाले नागार्जुन, श्वेनत्सांग के शिक्षक धर्मपाल, चंद्रकीर्ति, शीलभद्र, तर्कशास्त्री धर्मकीर्ति, बुद्धिस्ट लाॅजिक के संस्थापक दिड़नाद, जिन मित्र शांतरक्षित, पदमसंभव आदि अनेक प्रसिद्ध आचार्यों ने नालंदा में अपना अध्ययन एवं अध्यापन किया।
नालंदा दुनिया के आवासीय विश्वविद्यालयों में से सबसे पहला विश्वविद्यालय था। जहां 10 हजार छात्र एक साथ रहकर पढ़ाई करते थे, वहीं इन्हें पढ़ाने के लिए 2000 शिक्षक थे। नालंदा नाम के शाब्दिक मायने है ‘ज्ञान देने वाले’। नालंदा के इस नाम को चरितार्थ किया, विश्वविद्यालय के अनेक आचार्यों ने जिन्होंने पूरी दुनिया में बौद्ध संस्कृति एवं ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया।

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लाल ईटों से बना नालंदा महाविहार अपने समय में स्थापत्य कला का शानदार नमूना था। इसमें आठ अलग-अलग अहाते और दस मंदिर थे। इसके साथ ही अनेकों ध्यान-कक्ष एंव कक्षाएँ थीं। विश्वविद्यालय का पुस्तकालय नौतल्ले भवन में स्थित था, जिसमें महत्वपूर्ण ग्रंथों को रखा गया था। यहाँ प्रख्यात आचार्यों द्वारा प्रत्येक विषय की शिक्षा दी जाती थी। दुनिया के सभी हिस्सों कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, पर्शिया और टर्की के छात्रों और अध्येताओं को नालंदा विश्वविद्यालय ने अपनी ओर आकर्षित किया था।

सातवीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी यहां अध्ययन किया था। 1193 में विदेशी हमलावरों ने इस विश्वविद्यालय को तहस-नहस कर दिया। बहरहाल नालंदा विश्वविद्यालय के मौजूदा अवशेषों की खोज अलेक्जेंडर कनिघंम ने की। महाविहार के अवशेष​ ​चौदह एकड़ में फैले हुए हैं और इसका अधिकांश भाग अभी भी उत्खनित किया जाना है। वर्तमान समय में यहां दो मंजिली इमारत के भग्नावशेष हैं। इस विहार में एक छोटा सा प्रार्थनालय भी अभी सुरक्षित अवस्था में बचा हुआ है। इस प्रार्थनालय में भगवान बुद्ध की प्रतिमा स्थापित है।
नालंदा, राजगीर एवं बोधगया के ऐतिहासिक महत्त्व की वजह से हर साल पूरे भारत और विदेशों से हजारों पर्यटक यहां आते है।


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