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ये नेता दिनभर ट्विटर से तीर छोड़ते हैं लेकिन ‘नैंसी झा’ के लिए टाइम नहीं है ! SHAME…SHAME !

HUKUM DEV NARAYAN YADAV

गुंजन कुमार के साथ पंकज प्रसून की रिपोर्ट
30 मई 2017

नैंसी झा की मां और पिता को इस सवाल का जवाब चाहिए…जवाब चाहिए की आखिर मेरी मासूम बेटी ने किसी का क्या बिगाड़ा था? नैंसी की हत्या ने पूरे बिहार की छवि को धूमिल कर दिया है। गुस्से में है लोग…गुस्से में है आम लोग…गुस्से में हैं छात्र…गुस्से में हैं समाज का प्रबुद्ध वर्ग….गुस्से में है हर वो शख्स जिसको इंसानियत से प्यार है…लेकिन सबसे बड़ा सवाल की हमारे जनप्रतिनिधि क्या कर रहे हैं ? हमारी पुलिस क्या कर रही है? ये सारे सवाल आपके जेहन में भी घूम रहे हैं और हमारे जेहन में भी

ये वही देश है जहां किसी मंत्री की भैंस गुम हो जाती है तो पूरा का पूरा पुलिस तंत्र उस भैंस की तलाश में जुट जाती है। ये वही देश है जब किसी मंत्री की बेटी को आतंकी किडनैप कर लेते हैं तो उसके बदले में कई आंतकवादियों को रिहा कर दिया जाता है। ये वही देश है जहां किसी विधायक से लेकर मंत्रियों की सुरक्षा करने के लिए हमेशा सुरक्षाबल मुस्तैद रहते हैं। लेकिन इसी देश में नैंसी झा नामकी एक बच्ची को उसके घर से अगवा कर लिया जाता है तो पुलिस के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती है। पुलिस का काम बस इतना भर होता है कि नैंसी झा की डेड बॉडी के बारे में परिवार को इत्तिला कर दिया जाय। सोशल मीडिया पर हजारों लोग नैंसी झा को जस्टिस दिलाने की मांग कर रहे हैं। हैरानी की बात ये है कि इस देश के प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री, सांसद, विधायक सब सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव होने का दावा करते रहते हैं लेकिन इन तमाम बड़े-बड़े लोगों की निगाह जस्टिस फॉर नैंसी झा के मुहिम पर नहीं पड़ सकी है।

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मधुबनी के सांसद हुकुमदेव नारायण यादव जब संसद में गरजते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि मानो इनके अलावा इस धरती पर कोई दूसरा गरीबों और किसानों का शुभचिंतक बचा ही नहीं है लेकिन मधुबनी में एक के बाद एक लगातार हो रहे क्राइम पर इनका नजर नहीं जाता है। अगर इसके बारे में इनसे सवाल पूछा जाय तो इनका जवाब राज्य सरकार के मत्थे पर ठीकरा फोड़ देने के सिवा और कुछ नहीं होगा। लेकिन हम पूछना चाहते हैं कि क्या पीड़ित परिवार से मिलने और संवेदना प्रकट करने के लिए इनके पास 2 मिनट का भी वक्त नहीं है। अभी जबकी संसद का सत्र भी नहीं चल रहा है तो सांसद महोदय को अपने संसदीय क्षेत्र में ही होना चाहिए और मधुबनी के लोगों को अपराध मुक्त जिला बनाने के लिए राज्य सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करना चाहिए लेकिन अफसोस की इस पूरे मामले में उन्होंने मौन व्रत धारण कर रखा है

बिहार सरकार के मुखिया नीतीश कुमार पर गाहे-बगाहे विपक्ष जंगलराज का आरोप लगाता रहता है। अपराध का ग्राफ दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है लेकिन नीतीश कुमार लॉ एंड ऑर्डर को लेकर गंभीर नजर नहीं आ रहे हैं। सीधी सी बात है मधुबनी जैसे जगह में जहां पर लगातार क्राइम बढ़ता जा रहा है वहां पर कानून का खौफ बदमाशों को नहीं सता रहा है। ऐसे में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को चाहिए था की यहां तेज-तर्रार पुलिस अधिकारियों को मुस्तैद करते लेकिन यहां तो कई थाने ऐसे हैं जहां कि दारोगा भी कई सालों से एक ही जगह पर अंगद की तरह पैर जमाए हुए हैं।

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बिहार में इन दिनों चाचा-भतीजा के बीच ट्विटर वॉर चर्चा का विषय बना हुआ है। बिहार भाजपा के सबसे बड़े चेहरे यानि सुशील मोदी इन दिनों उनका बस एक ही काम नजर आता है। लालू परिवार का खाता-खरिहान में व्यस्त सुशील मोदी को और कोई दूसरा मुद्दा नजर ही नहीं आता है। पटना से मधुबनी की दूरी महज 4 से 5 घंटे की है लेकिन सुशील मोदी को इतना वक्त नहीं मिल पाया की वो पीड़ित परिवार से मिल सकें। चलिए मान लेते हैं कि सुशील मोदी जी का शेड्यूल बहुत व्यस्त रहता है तो कम से कम संवेदना की खातिर दो चार ट्वीट ही कर देते लेकिन नहीं उनका ट्वीट केवल और केवल लालू परिवार के लिए ही आरक्षित होता है। अब दूसरी तरफ बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव हैं…जब तेजस्वी यादव ने बिहार के उपमुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली तो संपूर्ण बिहार की युवा पीढ़ी को इनमें भविष्य नजर आने लगा। तेजस्वी यादव भी सोशल मीडिया पर खूब एक्टिव होते हैं लेकिन उनके ट्वीट भी चाचा सुशील मोदी को जवाब देने के लिए ही होता है। तेजस्वी यादव को खूब जानकारी होगी दरभंगा-मधुबनी के बारे में…हाल के दिनों में इस इलाके में अमानवीय तरीके से या यूं कह दीजिए कि निर्मम तरीके से लोगों की हत्या की गई…अगर तेजस्वी एक बार आकर पीड़ित परिवार से मिलकर संवेदना के दो शब्द भी कह देते तो लोगों को संतुष्टि मिल जाती लेकिन ऐसा कुछ देखने को नहीं मिला।

हमने जिन जनप्रतिनिधियों के बारे में आपको जानकारी दी है उन सबका फेसबुक ट्विटर पर एकाउंट है और ये सभी लोग सोशल मीडिया पर बहुत एक्टिव रहते हैं। आम आदमी त्रस्त है, इंसाफ की मांग कर रहा है लेकिन इन जनप्रतिनिधियों के पास पीड़ित परिवार के लिए संवेदना के दो शब्द लिखने का भी वक्त नहीं होता है।

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