23 अगस्त, 2017
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नीतीश कुमार को अपने पाले में लाकर एक तीर से कई शिकार किए हैं शाह-मोदी ने

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12 अगस्त : newsofbihar.com डेस्क (राशिद खान)

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से उनके निवास में हुई मुलाकात के मायने बिहार की राजनीति के परिपेक्ष्य में भले ही अहम हो सकते हैं। लेकिन बिहार की राजनीति के जानकार तो ये मानते हैं की बिहार में जदयू और भाजपा के गठबंधन का देश की राजनीति पर भी असर देखने को मिल सकता है। क्योंकी जब तक नीतीश कुमार महागठबंधन का हिस्सा थे तब तक उन्हें 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए मोदी का विपक्षी खेमा उन्हें प्रधानमंत्री मोदी के 2019 के सियासी विकल्प के तौर पर पेश कर रहा था और हो सकता है की अगर विपक्षी पार्टीयों से मोदी के विकल्प के तौर पर 2019 में कोई कद्दावर नेता विकल्प के तौर पर नहीं उभरता तो विपक्षी पार्टीयां जिनकी अगुवाई कांग्रेस कर रही है वो शायद किसी ऐसे नेता को आगे करती जिसकी छवि स्वच्छ और सुशासन वाले नेता की हो जो 2019 में मज़बूती के साथ मोदी का विकल्प बन सके। लेकिन इसे भाग्य कहें या फिर करनी का फल जिस एक नेता पर सारे विपक्षी खेमे की नज़रें टिकी थी उसे भी मोदी शाह की सियासी तिकड़म के आगे घुटने टेकने पड़े। क्योंकी नीतीश को 2019 में प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के तौर पर पेश करने के कई ठोस कारण भी हैं नीतीश नि:संदेह बेदाग औऱ अचछे सुशासन वाले नेता की छवि रखते हो उसके अलावा वो ओबीसी वर्ग से भी तालुक्क रखते हैं और खासकर बिहार और यूपी की राजनीतिक बिसात देश की राजनीति के शीर्ष पर पहुंचाने के लिए मददगार साबित हो सकती है।

यूपी और बिहार का राजनीतिक गणित

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यूपी और बिहार के राजनीतिक गणित की बात करें तो यहां 120 लोकसभा की सीटें है। मुस्लिम और ओबीसी और दलित वोटों के गणित के सहारे विपक्षी खेमा मोदी को अच्छी टक्कर दे सकता है। भले ही विपक्षी खेमे के लिए नीतीश की 2019 की उम्मीदवारी मजबूरी हो लेकिन उलके आगे इससे अच्छा विकल्प नहीं हो सकता था। खैर अब के हालात के सियासी गणित की बात करें तो मोदी और शाह की जोड़ी ने लगता हो एक तीर से कई शिकार किए हैं। एक तो उन्होंने 2019 के लिए मोदी के उभरते विकल्प को खत्म कर दिया दूसरा जेडीयू को एनडीए में शामिल होने का न्यौता देकर उन्होंने 2019 के लिए बिहार की 40 लोकसभा सीटों पर अभी से दांव लगाना शुरु कर दिया है। क्योंकी अगर 2019 में महागठबंधन के बैनर तले बिहार के विधानसभा चुनाव की तरह संयुक्त रुप से उम्मीदवार मैदान में उतारे जाते तो शायद पिछले विधानसभा के परिणामों को दोहराया जा सकता था।

नीतीश ने भी बहुत ही सोच समझकर अपना ये सियासी कदम उठाया है। भले ही मजबूरी में नीतीश ने लालू के साथ मिलकर महागठबंधन की नींव रखी हो लेकिन ये तो जग ज़ाहिर है की लालू औऱ नीतीश में कभी बनी नहीं है। लालू नीतीश को कई बार कोसते रहे हैं। नीतीश भी लालू पर सियासी पलटवार करते रहे हैं। इसके अलावा जिस रहस्यमयी और रोचक अंदाज़ में नीतीश ने बीजेपी से हाथ मिलाकर सियासी पटखनी दे दी। उससे वे जनता तक अपना ये संदेश पंहुचाने में सफल रहे हैं की उन्होंने लालू परिवार के भ्रष्टाचार के आगे घुटने नहीं टेके।

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बहरहाल देखने वाली बात ये होगी की अमित शाह ने नीतीश को जेडीयू को एनडीए में शामिल होने का न्यौता दे दिया है। इस न्यौते के बाद आपको बहुत जल्द देश में नए राजनीतिक संकेत देखने को मिल सकते हैं। एनडीए में जेडीयू को शामिल करने का न्यौता क्या अमित शाह इसका सिर्फ सियासी फायदा लेना चाहते हैं या इसके पीछे उन्होंने बिहार की प्रगति को अपने अंतर्मन में जगह देकर नीतीश को निमंत्रण दिया है।

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