24 जून, 2017
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प्रतिभावान बिहारी एडिटर की कहानी…जानिए कैसे तय कर लिया हाॅकर से संपादक तक का सफर!

patna

रोशन कुमार मैथिल की रिपोर्ट

पटना, 8 सितम्बर। कौन कहता है कि आंसमा में सुराख नहीं होता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों। जीं हां हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होती। कुछ ऐसा ही कर दिखाया है उस प्रतिभावन बिहारी एडिटर ने। जिन्होंने कभी स्ट्रिगंर के रूप में पत्रकारिता की शुरूआत की। परिस्थिति खराब होने के कारण स्टेशन पर हाॅकर बन अखबार बेचा और वर्तमान में पूर्वोत्तर से प्रकाशित अग्रणी हिन्दी दैनिक पूर्वोदय अखबार में संपादक के रूप में कार्यरत हैं। आइए जानते हैं संपादक रवि शंकर रवि की जुबानी उनकी अपनी आप बीती कहानी…

संभव है कि आपको मेरी बातों पर यकीन न हो, लेकिन जो कह रहा हूं वह सच है। बात 1985 की है। उस वक्त मैं भागलपुर से प्रकाशित होने वाली ‘नई बात‘ में संथाल परगना से लगातार लिख रहा था। तब मैं पाकुड़ के सिंधी माध्यमिक विद्यालय में शिक्षक था। अखबार से मिलता कुछ नहीं था, लेकिन प्रसून लतांत, प्रेम प्रभाकर जी, आशुतोष, डा योगेंद्र और किशन कालजयी के सानिध्य में पत्रकारिता सीखने का मौका जरूर मिल रहा था। ये सभी वहां डेस्क पर थे। छपने का भरपूर मौका था। किसी नए पत्रकार के लिए इससे अच्छा मौका और क्या हो सकता है।

उसी दौरान मैंने अपने घर वालों की इच्छा के खिलाफ 28 मई 1985 को शादी कर ली। नौकरी छोड़नी पड़ी और सड़क पर आ गया।
तब नई बात के संपादक राजेंद्र सिंह, जिन्हें हमलोग गुरुजी कहते थे, एक उपाय बताया-पैसे देने की स्थिति नहीं है, तुम चाहो तो भागलपुर स्टेशन पर अखबार बेच सकते हो, जितना बेचोगे, वह तुम्हारा। मैं अखबार की प्रतियां उपलब्ध करा सकता हूं। मैंने स्वीकार कर लिया, क्योंकि घर वाले के सामने झुकना नहीं चाहता था। उस वक्त भागलपुर से सिर्फ यही अखबार छपता था। पटना से प्रकाशित अखबार दस बजे के बाद आता था। उन दिनों मैं ससुराल में रहता था। सुबह साढ़े चार बजे साइकिल से करीब पांच किमी का सफर तय कर स्टेशन आता, अखबार का बंडल लेता और स्टेशन पहुंच जाता। उस वक्त सबसे पहले ट्रेन कटुवा लोकल पांच बजे खुलती थी।

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पहले कुछ दिन यह काम बड़ा भारी लग रहा था, यदि कोई देख ले तो क्या सोचेगा। लेकिन बाद में मैं सहज हो गया। कई परिचित भी मिले, लेकिन मुझे शर्म नहीं आई। हालांकि यह काम सिर्फ दो माह की कर पाया। फिर मधुपुर में स्वयंसेवी संगठन-लोक जागृति केंद्र आ गया। पत्नी भी वहां काम करने लगी। लिखने की बीमारी लग चुकी थी, इसलिए सांस्कृतिक रिपोर्ट दिनमान और रविवार में भेजने लगा। अक्सर छपती भी थीं। जनसत्ता में भी खास खबर और खोज खबर नाम से दो पेज थे। उसके लिए नियमित लिख रहा था। उसके पहले कभी प्रभाष जोशी जी से मिला नहीं था। बिना किसी जान-पहचान के भी रिपोर्ट छप रही थीं।

16 अगस्त, 1986 में नवभारत टाइम्स से जुड़ गया, वहीं सक्रिय पत्रकारिता का आरंभ हुआ। तब मैं संथाल परगना का प्रभारी था। तबादला होकर धनबाद पहुंचा। वहां पर नभाटा छोड़ दिया। कुछ दिनों तक चर्चा साप्ताहिक नामक अखबार का संपादन किया और आज के धनबाद संस्करण में नौकरी करने लगा। वहीं से गुवाहाटी आया। उत्तरकाल, पूर्वांचल प्रहरी से होता हुआ, दैनिक पूर्वोदय के साथ जुड़ा। इस दौरान कई उतार-चढ़ाव आए। राजेंद्र माथुर, प्रभाष जोशी, आलोक मेहता, दीनानाथ मिश्र, मंगलेश डबराल जैसे विशिष्ठ संपादकों का सानिध्य मिला और 27 अगस्त को दैनिक पूर्वोदय का संपादक बनने का मौका मिला।

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