03, Dec, 2016
ब्रेकिंग न्यूज़

NEWS OF BIHAR

आप भी जानिए प्रेम व आस्था का प्रतीक “रक्षाबन्धन” की क्या है पौराणिक कथाएँ

Raksha-Bandhan

रक्षा + बन्धन = रक्षाबन्धन। रक्षा शब्द रक्ष् धातु से बना है, जिसका अर्थ विघ्न एवं संकटों से रक्षा करने वाला या बचाने वाला होता है। बन्धन शब्द बंध् धातु से बना है जिसका अर्थ बाँधना है। किससे तो प्रेम व वचन से रक्षा के लिए बंध जाना व वचनबद्ध हो जाना होता है। बंध् धातु से ही बंधु अर्थात् भाई शब्द बना है। अत: रक्षाबंधन पर्व को भाई-बहन से भी जोड़ा गया है। इस दिन बहन भाई के कलाई में राखी बाँध कर अशेष मंगल की कामना करती है। शास्त्रों में ऐसा वर्णन मिलता है कि गणेश जी को बहन जब राखी बाँध रही थी इसे देखकर गणेश जी का दोनों पुत्र शुभ व लाभ बहुत दुखी हो गये क्योंकि इनको बहन नही था। पुत्र को दुखी देखकर श्रीगणेश ने ऋध्दि व सिद्धि में योग अग्नि प्रज्वलित की जिससे संतोषी माँ नामक कन्या जन्म ली और शुभ व लाभ को बहन प्राप्त हुआ। नारी सशक्तिकरण के रुप में भी राखी का महत्वपूर्ण भूमिका है जिसमें महिला सम्मान व रक्षा की भावना प्रगट होता है।

रक्षाबन्धन के संबध में अनेकानेक कथा प्रसिध्द है। शिशुपाल का जब श्रीकृष्ण वध कर रहे थे तब सुदर्शन चक्र से कृष्ण का तर्जनी अंगुली में चोट लगा तब द्रोपदी ने साड़ी फारकर उनके अंगुली पर पट्टी बाँधी वह दिन श्रावण पुर्णिमा का ही दिन था। इसी के फलस्वरूप कृष्ण ने द्रोपदी को चीड़हरण के समय द्रोपदी का भरी सभा में लाज बचाकर धर्म व वचन दोनों को निभाया था।

राजा बली से वामन भगवान् तीसरे पग में भूमि मांगने के बाद वरदान स्वरुप बली के द्वारपर बन्ध जाते हैं तब लक्ष्मी बली को राखी बाँधकर उपहार में बली से वामन भगवान् को मांगती है बली अचेत हो जाता है तब कृष्ण दो रुप में पहले रुप में बली के द्वार पर और दूसरे रुप में लक्ष्मी के साथ बैकुंठ जाते हैं।

रक्षा बंधन के दिन पंडित या पुरोहित भी अपने यजमानों को घर जाकर कच्चे धागे या रक्षासूत्र बांधकर सतत् रक्षा की मंगलकामना करते हैं।
यह मंत्र पढ़कर रक्षासूत्र बाँधा जाता है –
“येन बध्दो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:
तेन त्वां प्रतिबध्नामी रक्षे माचल माचल।।”

अर्थात जिस रक्षासूत्र से बली को बाँधा गया था उसी सूत्र से मैं आपको बाँध रही हूँ आप अपने वचन से कभी विचलित न हो । श्रावण पूर्णिमा को मनाए जाने के कारण इसे श्रावणी पर्व के भी नाम से जाना जाता है। भद्रा के समय में रक्षाबन्धन शास्त्रानुसार वर्जित है
“भद्रा द्वे न कर्त्तव्ये श्रावणी फाल्गुनी तथा
श्रवणी नृपति हन्ति ग्रामं हन्ति च फाल्गुनी ।।”

अर्थात् भद्रा के समय में दो कार्य नहीं करना चाहिये श्रावणी अर्थात् रक्षाबन्धन तथा फाल्गुनी अर्थात् होलिका दहन। श्रावणी करन से राजा/गृहप्रमुख तथा फाल्गुनी करने से गाँव या नगर में अग्नि प्रकोप होने का आशंका रहती है। इस वर्ष 18/8/2016 अर्थात् श्रावण शुक्लपक्ष पूर्णिमा गुरुवार को रक्षाबन्धन है जो भद्राकाल से प्रभावित नहीं है। अतएव सूर्योदय के उपरान्त से ही राखी बांधने का शुभ मूहुर्त प्रारम्भ हो जाता है।

इस आलेख के लेखक डॉ. रामसेवक झा है जो की आदिनाथ मधुसूदन पारसमणि संस्कृत महाविद्यालय, रहुआ-संग्राम, मधुबनी में व्याकरण विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर कार्यरत है।

newsofbihar.com की ख़बरें अपने न्यूज़फीड में पढ़ने के लिए पेज like करें  

 
 

newsofbihar.com की ख़बरें अपने न्यूज़फीड में पढ़ने के लिए पेज like करें

newsofbihar

अपने विचार साझा करें

आवश्यक लिखें चिह्नित:*

Powered By Indic IME