24 फ़रवरी, 2017
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पितृपक्ष में पिंडदान पर आधारित पुनपुन से बिशेष रिपोर्ट !

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मसौढी़ से अरुण कुमार की रिपोर्ट
पटना, 20 सितम्बर : पौराणिक युगों से चली आ रही पुनपुन घाट पर अंतर्राष्ट्रीय पितृपक्ष मेला का शुभारम्भ हो चुका है। प्रत्येक साल भाद्रपक्ष की पूर्णिमा से आशिन मास की अमावस्या तक लगने वाला पन्द्रह दिनो का यह मेला सनातन धर्म वालों के लिय बडा़ महत्वपूर्ण माना गया है। पुनपुन में युगों से पिंडदान श्राद् और तर्पण का कार्य होते चला आ रहा है, इसलिए हिन्दू धर्मावलम्वियों के लिए यह भूमि पूज्नीय माना गया है। यही कारण है कि प्रत्येक वर्ष लाखों तीर्थयात्री पिंडदान कर अपने पितरों एवं पूर्वजों को भवबंधन से मुक्ति प्राप्त कर मोक्ष प्राप्त करते हैं। इसलिए पुनपुन पिंडदानीयों के लिए महत्वपूर्ण प्रथम द्वार माना जाता है।

प्रस्तुत है पुनपुन में पिंडदान पर आधारित एक बिशेष रिपोर्ट…

प्रत्येक वर्ष देश विदेश से काफी संख्या में पिंडदानी, पिंडदान करने पुनपुन धाट पहुंचते हैंऔर पुनपुन नदी में स्नान कर धाट पर पूजन, हवन, एवं आत्मा रूपी चावल या जौ का आंटा को पिंड बनाकर पिंडदान करते हैं। उसके बाद गया फल्गू नदी पर पिंडदान के लिय प्रस्थान कर जाते हैं। आदिगंगा पुनपुन पिंडदानियों के लिए बडा ही महात्म का स्थल माना गया है। आदिगंगा (गंगा की बहन) सूरसरि गंगा से भी ज्यादा महत्व पुनपुन को माना गया है। पौराणिक कथा के अनुसार आदौ तु गोमती गंगा द्वितिय चः पुनः पुनः तृतीय कथिता रेवाः चतुर्थी जाह्नवी मतः । इसकी चर्चा रामायण, महाभारत और वेद पुराण में की गयी है।
पिंडदान
पितरों की मुक्ति के लिय पिंडदान करना पिंडदान कहलाता है। आत्मा भटके नहीं और पुनः मनुष्य योनि में दूसरे जन्म, जन्म हो। आत्मा रूपी पिंड से पिंडदान किया जाता है। जिन्दगी में पिंडदान तीन बार ही किये जाते है

तर्पण
नाम,जन्म,गोत्र लेकर पितरों को जल देना तर्पण कहलाता है।

प्रेतात्मा
प्रेतशिला में अकाल मृत्यू, दुर्घटनाग्रस्त,जलकर मरने के बाद प्रेतात्मा की शांति के लिय प्रेतशिला मे लोग पिंडदान करते हैं। सुखमय जिन्दगी ,बंश की वृद्वि,संतानहीन को संतान के लिय लोग पिंडदान करते है और पन्द्रह दिन स्वप्न रूप में दर्शन देते हैं।

नेपाल, वर्मा, कोलकाता, राजस्थान, गुजरात, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, गोरखपुर, जनकपुर, बलिया, उत्तर बिहार आदि स्थानो से यात्रीगण अधिक संख्या में उपस्थित होकर यहां विधिवत पिंडदान कर पुनपुन धाट की शोभा बढाते रहते है। इतना ही नहीं काफी संख्या में देश बिदेश से यात्री पहूंच गोदान, मुंडन, स्नान, तर्पण और प्रथम पिंडदान किया करते हैं तत्पश्चात गया धाम के लिय प्रस्थान कर जाते हैं।

मगध देश में चार तीर्थधाम है गया राजगृह , देवकुण्ड, और नदी में पुनः पुनाः । गया के पंचकोस में तथा गया शिर के एक कोस में पिंडदान करने से अनन्त पुण्य होता है। मकर के संक्रांति में यदि सूर्य ग्रहण और चन्द्रग्रहन हो तो गया में पिंडदान करने का महत्व तीनों लोक में दुर्लभ है।
पुनपुन घाट को अंतर्राष्ट्रीय स्थल होने के कारण बिहार सरकार मेला प्राधिकार में शामिल कर लिया है।और मेले में काफी व्यवस्था की गयी है। साफ सफाई, सुरक्षा, स्टेशन पर सभी गाडियों का ठहराव, नदी में गोताखोर, नाव, चलन्त अस्पताल, शौचालय की व्यवस्था की गयी है।
अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए लोग पिंडदान करते है, ऐसा माना जाता है कि पूर्वजों को पिंडदान करने से दैहिक, दैविक, और भौतिक तपों से मुक्ति प्राप्त कर मोक्ष की प्राप्ति होती है इससे इंकार नहीं किया जा सकता।

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