05, Dec, 2016
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रिश्ता पर राजनीति भाड़ी, राबड़ी देवी नहीं बांधेगी साधू-सुभाष की कलाइयों पर राखी !

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पटना, 18 अगस्त : रक्षा बंधन। रक्षाबंधन ऐसा पर्व है, जिसमें बहनें भाई की सलामती के लिए ईश्वर से प्रार्थना करती हैं भाई की दाईं कलाई पर रेशम की डोरी से बनी राखी बांधती हैं और और भाई भी अपनी बहन की रक्षा का संकल्प दोहराता है। मिठाई से भाई का मुंह मीठा कराती हैं। राखी बंधवाने के बाद भाई बहन को रक्षा का आशीर्वाद एवं उपहार व धन देता है। बहनें राखी बांधते समय भाई की लम्बी उम्र एवं सुख तथा उन्नति की कामना करती है।

इस दिन बहनों के हाथ से राखी बंधवाने से भूत-प्रेत एवं अन्य बाधाओं से भाई की रक्षा होती है। जिन लोगों की बहनें नहीं हैं वह आज के दिन किसी को मुंहबोली बहन बनाकर राखी बंधवाएं तो शुभ फल मिलता है। इन दिनों चांदी एवं सोनी की राखी का प्रचलन भी काफी बढ़ गया है। चांदी एवं सोना शुद्ध धातु माना जाता है अतः इनकी राखी बांधी जा सकती है लेकिन, इनमें रेशम का धागा लपेट लेना चाहिए।

अधिकतर मामलों में भाई-बहन का प्यार ताउम्र बना रहता है, लेकिन कई बार इस पावन रिश्ते में दरार भी आ जाता है। ऐसा आम आदमी के परिवार से लेकर बड़े-बड़े राजनीतिक घरानों तक में होता है। ऐसी ही बात लालू यादव के परिवार में भी देखी जा सकती है। राबड़ी कभी अपने भाइयों साधु यादव और सुभाष यादव को बड़े धूमधाम से राखी बांधती थीं, लेकिन पिछले कुछ सालों में राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते यह रिश्ता उतना गहरा नहीं रहा है। आस-पास रहने के बाद भी भाई बहन नहीं मिलते हैं। राखी के दिन भी साधु और सुभाष राबड़ी से नहीं मिलते हैं। कभी लालू और राबड़ी के सबसे लाडले रहे साधू और सुभाष अब राबड़ी से राखी बंधवाने भी नहीं जाते है।

लालू राबड़ी की सरकार में दोनों भाइयों की जोड़ी को छोटे सरकार के नाम से जाना जाता था। लालू राबड़ी से ज्यादा साधु और सुभाष के घर पर दरबार लगता था। लालू और राबड़ी की सरकार जाने के साथ ही साधु और सुभाष बागी हो गए। रिश्ता धीरे-धीरे कटु होता गया। शायद राजनितिक महत्वाकांक्षा के बीच इस बार भी साधू और सुभाष की कलाइयाँ सुनी ही रह जाएगी।

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