मामूली से ड्राईवर का बेटा संतोष झा कैसे बना उत्तर बिहार का कुख्यात डॉन, पढ़िए पूरी खबर

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News of Bihar : संतोष झा… आज एक बार फिर से सभी के जुबान पर यह नाम है लेकिन आज उसके आतंकी साम्राज्य का अंत हो गया। कई अपराधिक मामलों में कुख्यात आरोपी संतोष झा की  दोपहर 3 बजे बिहार के सीतामढ़ी सिविल कोर्ट में पेशी के दौरान अपराधियों ने गोलियों से छलनी कर मौत के घाट उतार दिया। दबंग लुक के साथ गोरे चेहरे पर महंगा चश्मा, काले रंग की फुल टी-शर्ट और ब्रांडेड पैंट पहनना संतोष झा के शौक में शुमार था। जिसके सिर पर हत्या, लूट, रंगदारी, भयादोहन, विस्फोटक अधिनियम तथा आर्म्स एक्ट के कोर्इ 30 से अधिक मामले दर्ज थे।

जमींदारों द्वारा पिता की पिटार्इ के अपमान का बदला लेने के लिए माओवादियों की जमात में शामिल होने वाले संतोष की जिंदगी की कहानी पूरी तरह फ़िल्मी है। शिवहर जिले के पुरनहिया थाना अंतर्गत दोसितयां गांव निवासी संतोष झा के पिता चंद्रशेखर झा कभी गांव के हीं दबंग जमींदार परिवार से तालुक रखने वाले नवल किशोर यादव के जीप का ड्राइवर था। पंचायत भवन बनाने के सवाल पर हीं संतोष झा के पिता चंद्रशेखर झा की गांव के उन दबंगों से ठन गयी, जिसके घर वह नौकरी कर रहे थे। बस इतनी सी बात पर दबंग जमींदार ने चंद्रशेखर झा की जमकर पिटार्इ की। पिता पर जमींदारों के जुल्म ने शांत संतोष के चेहरे पर बदले की चिंगारी जला दी। उसके बाद संतोष झा माओवादियों के खेमें में मिल कर बदला लेने की कसम खायी और वर्ष-2003 में जमींदार नवल किशोर यादव के घर पर माओवादियों ने हमला कर इरादे स्पष्ट कर दिये। अदौड़ी में बैंक लूट, तरियानी के नरवारा में बैंक लूटने जैसी वारदात के अलावे देकुली पुलिस पिकेट से हथियार लूट के मामले में भी संतोष का नाम उछला था। पिता की पिटार्इ का बदला संतोष को इस कदर खौला दिया था कि उसने 15 जनवरी 2010 को अपने सहयोगियों के साथ सीतामढ़ी के राजोपटटी में पूर्व जिला पार्षद नवल किशोर यादव को उसके घर के बाहर गोलियों से भून दिया था। उसने उक्त हत्या को पिता की पिटार्इ का बदला बताया था।

नक्सलियों से अलग होकर उसने बदला लेने के लिए उक्त हत्या को अंजाम दिया था। बाद के दिनों में नक्सलियों से उसका जुड़ाव भी बढ़ गया और उसने उससे अलग अपना संगठन बिहार पीपुल्स लिबरेशन आर्मी बना लिया। नक्सली गौरी शंकर झा की हत्या के मामले में भी संतोष मुख्य आरोपित था। 24 नवंबर 2011 को गौरी शंकर झा को उसके घर पर हमला करने के बाद गोलियों से भून दिया गया था। वर्ष-2005 में संतोष झा को एसटीएफ ने पटना के एक होटल से गिरफ्तार किया था। बाद में पांच साल तक जेल में रहने के बाद वह जमानत पर छूट कर खूनी खेल को जारी रखा। इसके बाद वर्ष-2012 में रांची के बुटी मोड़ से वह अपने सहयोगी मुकेश पाठक के साथ पूर्वी चंपारण जिले की पुलिस के हत्थे चढ़ा था। कोर्ट में कांड के अनुसंधानकर्ता द्वारा केस डायरी में उसके आपराधिक इतिहास का उल्लेख नहीं करने पर जमानत मिल गयी और वह बाहर आ गया। उसके जेल से बाहर आने तथा पुलिस की कांड में लापरवाही को लेकर तब खूब किरकिरी हुर्इ थी। संतोष के पीछे यूं तो पुलिस काठमांडू से लेकर अन्य जगहों की खाक छान रहा था, लेकिन उसके संचार नेटवर्क और गतिविधियों पर पटना पुलिस मुख्यालय गिद्ध की भांति नजर गड़ाया था। यही कुछ वजह रही कि संतोष को बड़ी हीं चालाकी से पकड़ा जा सका था।

उत्तर बिहार का र्इनामी तथा बिहार पीपुल्स लिबरेशन आर्मी का चीफ संतोष झा सबसे अधिक चर्चा में उस समय आया था जब साल 2015 में बिहार के दरभंगा जिले में एक कंस्ट्रक्शन कम्पनी के इंजिनियरों को संतोष झा के गिरोह ने लेवी नहीं दिए जाने पर हत्या कर दी थी। संतोष झा का प्रभाव का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पुलिस कस्टडी में होने के वाबजूद सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, पूर्वी चंपारण, पश्चमी चंपारण, गोपालगंज तथा शिवहर जिले की पुलिस को नाको दम कर रखा था। संतोष झा को चाहने वालों की कमी भी नहीं थी, जब संतोष झा 15 फरवरी 2015 की दोपहर जब सीतामढ़ी पुलिस की कस्टडी में बख्तरबंद वैन से बाहर निकला तो जिला मुख्यालय, डुमरा स्थित व्यवहार न्यायालय के पास सैकड़ों की तादाद में मौजूद भीड़ उसकी एक झलक पाने के लिए इस कदर धक्का मुक्की पर उतारू थी की पुलिस के लिए उस भीड़ से संतोष झा को निकालने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी थी। पुलिस को भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि इस कुख्यात संतोष झा को देखने के लिए इतनी बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ जुट जायेगी। जिस व्यक्ति के नाम से कंस्ट्रक्शन कंपनियां कांप उठती थी, वह कस्टडी में पूरे इत्मीनान से दबंग की तरह हाथ हिला कर भीड़ का इस्तकबाल कर रहा था। संतोष झा के विरूद्ध दर्ज सर्वाधिक मामले सीतामढ़ी में दर्ज थे। पुलिस उस पर कानूनी शिकंजा कसने के लिए तेजी से उसके कांडों को खंगालना शुरू कर दी थी। उस समय संतोष झा को कड़ी निगरानी में मंडल कारा के सेल में रखा गया था। हालांकि उक्त कुख्यात अपराधी को सेल भा नहीं रहा है, सो अगले हीं दिन उसने जेल अधीक्षक से सेल से हटा कर उसे अस्पताल में रखने का आग्रह किया था, लेकिन जेल अधीक्षक उसके उक्त आग्रह को ठुकरा कर सामान्य खूंखार बंदी की हीं श्रेणी में रखा। खास बात यही है कि संतोष के कुछ छुटभैये शागिर्द भी उसी जेल के सलाखों में कैद थे, जिसके एक इशारे पर उक्त लोगों द्वारा कहर बरपाया जाता था। 17 फरवरी 2012 को मोतिहारी पुलिस की चुक के कारण कोर्ट से जमानत मिलने के बाद जेल से बाहर निकला यह शख्स उसके बाद की जिंदगी में इतना खौफनाक चेहरा बन गया कि पुलिस को उसे पकड़ने के लिए एक लाख रुपये का इनाम घोषित करना करना पड़ा। मोतिहारी जेल से बाहर आने के बाद संतोष का लाइफ स्टाइल भी बदल गया। इसके बाद तो वह कर्इ आपराधिक वारदातों को अंजाम देने के बाद रंगदारी की रकम से दिन दुनी रात चौगुनी तरक्की की राह गिनने लगा। सीतामढ़ी जिले की पुलिस के टाप टेन की सूची में नंबर वन संतोष झा की संपत्ति को जब्त करने की भी पुलिस ने कार्रवार्इ की। पुलिस की माने तो संतोष झा ने सिर्फ रंगदारी की रकम से करीब 50 करोड़ से अधिक की संपत्ति अर्जित की थी। पुलिस की तफ्तीस में यह बात सामने आयी है कि उक्त अपराधी के काठमांडू, जमशेदपुर, रांची, कोलकता में फ्लैट है तो उड़ीसा में उसके आलीशान होटल भी चर्चा में आया। इतना हीं नहीं असम के गुवाहाटी में उसने करोड़ों की लागत से एक बड़ा स्कूल तक खोल रखा था।