03, Dec, 2016
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शास्त्र के अनुसार 4 तारीख को ही मनाया जायेगा चौठचन्द्र : डॉ रामसेवक झा

Chaurchan-02

अध्यात्म, 02 सितम्बर : मिथिलांचल का लोकपर्व चौठचन्द्र भाद्रमास के शुक्ल की चतुर्थी सिद्धिविनायक चतुर्थी के नाम से जानी जाती है। इसमे किया गया दान, स्नान,उपवास ,अर्चन गणेशजी कृपा से सौ गुणा फलदायी हो जाता है। परन्तु इसदिन चन्द्रदर्शन निषेध रहता है। इसलिए कलंकित चन्द्रदर्शन से पूर्व लोग पूजा-पाठ कर दधि-फल व पकवान से चन्द्रमा का दर्शन कर स्यमन्तकमणि का कथा सुनते है जिससे दोषमिट जाता है। इसवर्ष चौठचन्द्र पर्व को लेकर लोगों में कुछ अधिक ही भ्राँति फैला दिया गया है। कुछ लोग 04 सितम्बर को तो कुछ 05 सितम्बर को चौठचन्द्र पर्व मनाने को सोच रहे हैं। कुछ विद्वान् तो आये दिन आधे-अधूरे शास्त्रों की पंक्तियाँ उल्लेख कर चौठचन्द्र 05 सितम्बर को मनाने का सप्रमाण कह रहे है। विडम्बना यह है कि शास्त्रों को न जानने वाले लोग कौन सी तिथि को प्रमाण मानकर चौठचन्द्र पर्व की तैयारियाँ प्रारम्भ करें। हम यहाँ पूर्व व उत्तर (04 व 05 सितम्बर) पक्षों का विवेचन करते हुए कुछ अन्य शास्त्रीय प्रमाणों के साथ 04 सितम्बर को ही चौठचन्द्र पर्व मनाने की युक्तियाँ प्रस्तुत कर रहे है।
मिथिलाञ्चल का सर्वमान्य पञ्चाञ्ग विश्वविद्यालय पञ्चांग जो कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा पूर्व-कुलपति ज्यौतिषशास्त्र व धर्मशास्त्र के प्रख्यात विद्वान् डा.रामचन्द्र झा जी के सफल मार्गनिर्देशन में विगत कई दर्शों से प्रकाशित किया जा रहा है। उक्त पञ्चाङ्गानुसार इस वर्ष भाद्रमास के शुक्लपक्ष चतुर्थी तिथि रविवार तदनुसार दिनांक 04 सितम्बर 2016 को है। इसीदिन हरितालिका तीज एवं चौठचन्द्र पूजन उल्लेखित है। रविवार को दिन के 05 बजकर 01 मिनट के उपरान्त चतुर्थी (चौठ) तिथि प्रारम्भ होकर पूरे रात उक्त तिथि का योग रहता है। इसदिन सूर्यास्त 06 बजकर 16 मिनट होता है। चौठचन्द्र पूजन में जहाँ चन्द्रमा की पूजा होती है। अर्थात् चन्द्रमा के पूजन समय में पूर्णरुप से चतुर्थी तिथि रहती है।

अब विचार करते है कुछ विद्वानों द्वारा 05 सितम्बर को चौठचन्द्र पर्व के तिथि व समय का। सोमदिन प्रातःकाल से ही चतुर्थी तिथि का प्रारम्भ होकर संध्या 06 बजकर 50 मिनट तक है। इसदिन सूर्यास्त 06 बजकर 14 मिनट तक है। अर्थात् जो चौठचन्द्र का पूजन व दर्शन करना चाहते है वे केवल 36 मिनट के अन्दर ही करेंगे।

अब विचार करते है कि कौन सी तिथि ग्राह्य व कौन-सी निषेध है। कृत्यसारसमुच्य धर्मग्रन्थों के अनुसार- ̄प्रदोषव्यापिनीयं ग्राह्या उभयदिने प्रदोषव्याप्तौ पंचमी युक्ता ̄ ̍ युगाग्निक्रतु भूतानि ̍ इत्यादि निगमात् ।अर्थात् चतुर्थी तिथि प्रदोष व्यापिनी (संध्याकालीन) ग्राह्य है। यदि दोनों दिन यह प्रदोषव्यापिनी हो तो पंचमी युक्त ग्राह्य है। इन्हीं बातों को लेकर हमारे कुछ विद्वानों ने 05 सितम्बर को चौठचन्द्र पर्व मनाने की धोषणा विभिन्न समाचारपत्रों के माध्यम से कर दिये जिससे लोगों में भ्रांति उत्पन्न हो गयी। परन्तु निर्णय सिन्धु , तिथिनिर्णयःतथा गीताप्रेस द्वारा वार्षिक प्रकाशित पर्वोत्सव-अङ्क व अन्य प्रामाणिक ग्रन्थों में कहा गया है कि यदि रविवार एवं मंगलवार को प्रदोष समय में चतुर्थी तिथि हो तो तृतिया युक्त चतुर्थी तिथि ही ग्राह्य है , जो अनन्तफलदायक होता है। इसलिए हमारी दृष्टि में विश्वविद्यालय-पञ्चांग ने 04 सितम्बर को चौठचन्द्र पर्व का उल्लेख किया है।
अतएव धर्मशास्त्र, व्यावहारिकता तथा समय की पर्याप्ता को ध्यान में रखकर 04 सितम्बर रविवार को ही चैठचन्द्र पर्व मनाना चाहिए।

आलेखकर्ता – मधेपुर प्रखण्ड के बाथ गाँव निवासी, आदिनाथ मधुसूदन पारसमणि संस्कृत महाविद्यालय में संस्कृत के व्याख्याता है।

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