22 अगस्त, 2017
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शिवहर जिले के सरकारी स्कूलों में आज भी बोरे पर बैठकर पढ़ने को मजबूर है बच्चे

uytyur

मो. हसनैन की रिपोर्ट

शिवहर, 25 नवंबर। भारत में लोकतांत्रिक भावना को ऐकीकृत व मजबूत करने का आधार शिक्षा ही है लेकिन भूमंडलीकरण व औधोगिकीकरण के इस युग मे कथित व्यावसायिक शिक्षा के विकास से शिक्षा अपने लक्ष्य से भटक गयी है। आज के दौर में शिक्षा इतनी महँगी हो गयी है कि आर्थिक रूप से पिछड़े परिवार के बच्चे स्कूल की दहलीज पर पहुंच ही नही पातें है। सरकारी विद्यालयों मे पढ़ाई लिखाई या अन्य व्यवस्था का जो हाल है उससे गुणात्मक शिक्षा की उम्मीद नहीं की जा सकती है। हम बात कर रहे है शिवहर जिले के तरियानी प्रखंड के राजकिय मध्य विद्यालय बंकुल की जहाँ बच्चे आज भी सीमेंट का बोड़ी बिछा कर भूमी पर बैठ कर पढ़ाई करने को मजबूर है। बात केवल इस सरकारी स्कूल की नहीं है ये हाल शिवहर जिले या यूँ कहे बिहार तथा भारत के बहुत सारे स्कूल की भी है। एक तरफ सरकार आर्दश स्कूल बनाने की बात करती है तो दुसरी तरफ बच्चों को बैठने के लिए बेंच टेबुल की भी व्यवस्था नहीं कर पाती है। ऐसी व्यवस्था रहने के बाद भी गरीब बच्चांे की मजबूरी है कि वे सरकारी विद्यालय के अलावा कही और पढ़ने जाने की कल्पना भी नही कर सकते है। क्यांे की निजी विद्यालय के प्रबंधक धनोपार्जन में लगे हुए है। प्राईवेट स्कूलों मंे दाखिला हिमालय फतह करने के समान है। देश में प्राईवेट स्कूलो मंे दाखिला की कवायद इतनी संघर्षशील है कि कई बार तो अभिभावको को लगता है कि वे बच्चे का दाखिला स्कूल मंे नही बल्कि मेडिकल इंजिनियरिंग या प्रबंध संस्थानो में करा रहें है। सरकार से अपील है कि वह सरकारी स्कूल की व्यवस्था पर ध्यान दे।

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