11, Dec, 2016
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कोसी ‘डायन’ से पीड़ित लोगों की अनसुनी दर्दभरी कहानी

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photo : Ajay kumar kosi

मधेपुरा, 28 जुलाई। आकाश में काली घटाएं घुमड़ रही है। अब बरसी की तब बरसी। बीच-बीच में बिजली कौंध जाती है। जहां तक नजर जाती है पानी ही पानी दिखता है। लहलहाती फसल देखकर इलाके के किसान क्या-क्या मंसूबे न बांधे थे। लेकिन कोसी ने पहले की तरह इस बार भी सारे अरमानों पर पानी फेर दिया। इसलिए तो कथा शिल्पी फनीश्वरनाथ रेणु ने अपनी रचनाओं में कोसी को डायन कोसी तक कह दिया। 36 घंटे हो गए कई बाढ़ पीड़ितों को एक भी दाना नसीब नहीं हुआ है। बच्चों को देखकर तो कलेजा मुंह को आ जाता है। पीड़ितों में तो अब रोने की प्रभुता भी नहीं रह गई है। वे सूनी आंखों से चारों ओर निहारते हैं। दूधमुंहा भले ही मां छाती से चिपटकर चुटुर-चुटुर कर संतोष कर लेता हो लेकिन बेचारी मां क्या करे। आलमनगर प्रखंड के रतवारा पंचायत अन्तर्गत मुरौत गांव के निवासी मधुवाला देवी, संजय शर्मा, बासुकी शर्मा, अशोक शर्मा आदि बताते हैं लूटते, मरते, भूख, बीमारी ङोलते बाढ़ पीड़ितों का दर्द कोई नया नहीं है। बाढ़ का रौद्र रूप जब घर-द्वार के साथ पशुधन और स्वजनों को अपने भूखे उदर में समेट लेता है तब हमारे पास शोक मनाने के सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता।

बात आगे बढ़ाते हुए बताते हैं कि पानी भी कैसे पिएं। लगता है समन्दर का पानी आ गया है। गाढ़ा गाद से भरा लाल पानी। गाय, भैंस, बकरियां न जाने बहकर कहा चले गए। और अनाज! आदमी के तो खड़ा होने की जगह नहीं, उसे (अनाज) कहां रखें लोग। जिस मिट्टी ने दिया उसी में समां गया। जिस पानी ने दिया वहीं बहा ले गया। आदमी के गिनती में है क्या। लज्जा, हया, पर्दा सब बह गई धार में। मजबूर महिलाएं…विवश पुरुष शौच के वक्त भी कोई पर्दा नहीं। भूख से आंत सिकुड़ी जा रही है। पांव काम नहीं कर रहा। बच्चों की दशा तो देखकर लगता है कि हे धरती फटो हम समां जाएं। कोसी तटबंध पर पीड़ितों की भीड़ जमीं है। बार-बार आंखे आसमान की ओर उठ जाती हैं। कभी ये आंखें सड़कों को निहारती है कि कोई आएगा, भोजन का पैकेट देकर जाएगा। हर वर्ष की तरह इस इलाके में बाढ़ पीड़ितों के बीच राशन बांटने के लिए हेलीकाप्टर भी उड़ान भरता है पर इस बार ऐसी कोई व्यवस्था नहीं। एकाएक ठनका ठनकता है लगता है देह पर ही गिरेगा। बज्र गिर भी जाए तो मुक्ति मिल जाएगी। पीड़ित बुदबुदाते हैं ऐसे में हेलीकाप्टर भी कैसे उड़ेगा, बादल छंटे तब ना । वे जानते हैं कि जब तक बादल आसमान में घिरा रहेगा। तब तक हेलीकाप्टर भी उन्हें राहत सामग्री नहीं पहुंचा सकती।

मधेपुरा के डीएम साहब बाढ़ पीड़ितों की दशा को तो देख आएं हैं, पर पीड़ितों की पीड़ा को बांटने अभी तक कोई सरकारी आदमी राशन लेकर वहां नहीं पहुंचा है। सबको जान प्यारी है। इस झंझाबात में कौन जाएगा जान देने। मोबाइल भी काम नहीं कर रहा। हित, कुटुंब..दोस्त, मुहिम सब अलग-थलग। इधर भारी शोर-शराबा हो रहा है। हाय रे दैवा, सारी विपत्तियां एक साथ आ गईं। वहीं अच्छा है। जो दिल्ली, पंजाब चला गया। समय बदले तो हम सब भी चले जाएंगे। यहां रहकर हर साल सजा कौन भोगे। सहरसा के चुनावी भाषण में नेताजी (प्रधानमंत्री) कहिन थे, वोट दीजिए अब बाढ़ नहीं आएगी। सबके होठों पर हंसी होगी। लेकिन, हंसी तो दूर आंख के आंसू भी सूख गए हैं। ईश्वर ने सबकुछ तो पानी में डुबा दिया है। लेकिन आंख का पानी सूख रहा है, कहां जाएं क्या करें।
साभार: संजय सिंह

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