08, Dec, 2016
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“अंकल” श्याम बिहारी प्रसाद… एक गुमनाम हीरो !

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NOB डेस्क : मिलिए बीएसएनएल, पटना से सेवानिवृत सहायक महाप्रबंधक “अंकल” श्याम बिहारी प्रसाद से, एक गुमनाम हीरो जो तीन साल से दिल्ली के फुटपाथ पर बच्चों को मुफ्त में पढ़ा रहे हैं।
सन 2013 की सर्दियों में, वसंत कुँज, नई दिल्ली में अपनी बेटी के साथ रहने वाले “अंकल” श्याम बिहारी प्रसाद, एक दिन सुबह मंदिर से निकले तो बाहर फुटपाथ पर खड़े एक बच्चे को प्रसाद दिया। अगले दिन वे कुछ बिस्कुट खरीद कर साथ ले आए और फुटपाथ के बच्चों को बिस्कुट बाँटे। इस तरह बच्चों से रोजाना मिलते और बात करते हुए अंकल ने जाना कि उन बच्चों के माता-पिता दोनों ही मेहनत मजदूरी करते थे। चूँकि सर्दियों में दिल्ली के स्कूल 10 बजे खुलते थे, इसलिए वे घर बंद करके बच्चों को बाहर ही छोड़ जाते थे। ये बच्चे मंदिर के बार फुटपाथ पर खड़े हो कर भीख माँगते थे।
बच्चों के साथ संवाद में अंकल ने जाना कि कौन किस स्कूल और किस कक्षा में पढ़ता था। अंकल ने बच्चों से सामान्य प्रश्न पूछे तो पता चला कि उन्हें गणित और विज्ञान की सरल जानकारियाँ भी नहीं थी। वे न तो अंग्रेजी और न हीं हिंदी ठीक से लिख पाते थे। एक दिन उन्होंने बच्चों से पूछआ कि क्या वे पढ़ना चाहते हैं। बच्चों से सकारात्मक उत्तर पाकर अंकल ने उनसे कहा कि अगले दिन से वे सुबह 8 बजे मंदिर के बाहर फुटपाथ पर उन्हें मिलेंगे और पढ़ाएँगे। उस दिन से आज तक अंकल गली के उन बच्चों को निरंतर पढ़ा रहे हैं।
किसी नियमित स्कूल की तरह ही फुटपाथ पर रोजाना सुबह 8 बजे पहले प्रार्थना होती है, फिर पढ़ाई शुरू हो जाती है। धीरे-धीरे आस-पड़ोस के लोगों ने भी रुचि लेनी शुरू कर दी। कई लोगों ने अपनी सेवाएँ देने की पेशकश की। आज मंजू मैडम आ कर बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाती हैं। सिंह भैया गणित पढ़ाते हैं, कृतिका मैडम विज्ञान और गणित दोनों पढ़ाती हैं। अन्य लोग भी हैं जिनमें से कोई पुस्तकें दान कर देता है तो कोई स्टेशनरी। कुछ लोग बच्चों के लिए नाश्ता लाते हैं।
बरसात या सर्दी के दिनों में जब बच्चों का बाहर खुले में बैठना संभव नहीं होता, तो अंकल अपनी पाठशाला को उठा कर मंदिर परिसर में अंदर ले जाते हैं और मंदिर के व्यवस्थापक भी कोई ऐतराज नहीं कर पाते। मतलब यह कि आँधी, गर्मी, बारिश किसी भी मौसम में उनकी कक्षाएँ रुकती नहीं हैं। सड़क पर बहते ट्रैफिक का शोर हो या फुटपाथ के पास से गुजरने वाले पैदल यात्रियों की बातें- कुछ भी इन बच्चों के ध्यान को भंग नहीं करता है।
अंकल बताते हैं कि जब उन्होंने फुटपाथ पर पढ़ाना शुरू किया था तो उनके पास किसी से माँगी हुई केवल एक चटाई थी, कोई कुर्सी नहीं, कोई टेबल नहीं। अंकल को जमीन पर पढ़ाते देख, स्थानीय दुकानदार आगे आए और किसी ने कुछ दान में दिया किसी ने कुछ।
आज उनकी फुटपाथ की पाठशाला में ग्यारहवीं कक्षा तक के छात्र पढ़ रहे हैं। ऐसे गुमनाम फरिश्ते के बारे में जानकारी साझा करना मुझे पुण्य का काम लगा।

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