01 मई, 2017
To Advertise on this Website call Us on 9155705448, 8130906081
ब्रेकिंग न्यूज़

NEWS OF BIHAR

वैज्ञानिक,स्वास्थ्य व कृषि की दृष्टि से लाभप्रद है नवरात्रा : डॉ. रामसेवक

durga-navratri

“उत्सवप्रियाः खलु मनुष्याः ” अर्थात् मानव उत्सव प्रिय होते है । भारतीय संस्कृति में उत्सव की प्रमुखता रही है । छः ऋतुओं से ग्रथित यह भारत भूमि पर चार ऋतुएं तो प्रमुखता से सर्वत्र व्याप्त है । ‘कलौ चण्डी महेश्वरौ ’ अर्थात् कलयुग में चण्डी ( भगवती) व महादेव की प्रधानता बताई गयी है । भारतीय संस्कृति में तो प्रत्येक चार-चार माह के अन्तराल में नवरात्रों ( आश्विन-माघ-चैत्र-अषाढ़ ) का शास्त्रों में वर्णन किया गया है परन्तु हमारे यहाँ शारदीय (आश्विन) व वासंती (चैत्र) नवरात्र को प्रमुखता से मनाया जाता है । प्रत्येक मनुष्य के मन में स्वतः ही यह प्रश्न प्रस्फुटित होता है कि नवरात्र आश्विन व चैत्र में ही क्यों प्रमुखता से मनाया जाता है ? दरअसल ये दोनों महीने ‘संधिकाल’ के नाम से जाने जाते है । इसका ऋतु-वैज्ञानिक, कृषि व स्वास्थ्य के दृष्टि से विवेचन किया जाए तो ये दोनों ही महीनें सर्दी व गर्मी की संधि के महत्वपूर्ण मास है । इसलिए मानव के स्वास्थ्य व कृषि पर इनका विषेष प्रभाव पड़ता है । वर्षा ऋतु के बाद आश्विन मास में अत्यधिक वर्षा होने के फलस्वरुप घर के आस-पास जल जमाव हो जाता है जिसमें विभिन्न प्रकार के कीड़े मकोड़े पनपने लगते है,परिणामतः विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न होने लगते है । साथ ही शरद ऋतु के प्रारम्भ होने से शरीर में रक्त संचार में शिथिलता उत्पन्न होने लगता है । ठीक इसीप्रकार चैत्र मास से पूर्व वसंत ऋतु का प्रभाव प्रत्येक मानव के शरीर पर पड़ा रहता है । शरद ऋतु के उपरान्त चैत्र में गर्मी प्रारम्भ होते ही पिछले कई महीनों से शरीर में जमा हुआ रक्त उबलना प्रारम्भ हो जाता है । साथ ही शरीर के कफ-पित-वात भी खौलने लगता है जिससे शरीर में विभिन्न प्रकारों के रोग उत्पन्न होने लगते है । यहीं कारण है कि रोगी इन दोनों मासों (आश्विन-चैत्र) में या तो शीघ्र स्वस्थ हो जाते है अथवा मृत्यु या विभिन्न असाध्य रोगों से ग्रसित हो जाते हैं । एतदर्थ भक्तगण स्वस्थ रहने के लिए इन दोनों मासों में भगवती की आराधना प्रारम्भ करते हुए ‘जीवेम शरदः शतम् ’ की प्रार्थना करते है ।
ज्योतिष्य शास्त्रानुसार – ‘‘लंकानगरयामुदयाच भानो तदेव वारं प्रथमं वभूव । मधो सितोदेर वर्षमासयुगपत् प्रवृत्ति’’(सिद्धान्तशिरोमणि,भास्कराचार्य,कालमानाध्याय,श्लोक सं.-15)। अर्थात् सर्वप्रथम चैत्र शुक्ल प्रतिपद तिथि को ही दिन की प्रवृत्ति गणना प्रारम्भ हुई ।

ये भी पढे़ं:-   कलयुग में भगवान शिव का साक्षात दर्शन!

इसी उपलक्ष्य में चैत्र नवरात्र की प्रासंगिकता प्रतीत हो रही है । विक्रमादित्य द्वारा संवत्सर की शुरुआत चैत्र शुक्ल प्रतिपद तिथि को हुई एतदर्थ चैत्र नवरात्र की प्रधानता दिखाई देती है । शास्त्रान्तरगत ऐसी मान्यता है कि शुक्ल प्रतिपद तिथि को जो दिन का वर्षेश ( वर्ष का राजा ) होगा । अतएव ऐसी राजा के उपलक्ष्य में चैत्र नवरात्रों का समालोचन किया जाता है । उसी प्रकार देवीभागवत में उल्लखित है कि ‘ शरतकाले महापूजा….’ अर्थात् आश्विन शरद ऋतु में जो भक्त मेरी आराधना विधि-विधान पूर्वक करते है मैं उनका सम्पूर्ण मनोकामनाएँ पूर्ण करता हूँ ।
इन्हीं बातों को यदि कृषि आधारित देखें तो भारत एक कृषि प्रधान देश है । भारत की सर्वाधिक व्यवस्था कृषि पर आधारित है । इन दोनों मासों में कृषक द्वारा बोये गये फसल की कटाई का समय होता है । आश्विन मास में धान की कटाई वहीं चैत्र मास में खेतों में गेहूँ व दलहन कटाई प्रारम्भ होने लगता है । एतदर्थ किसान लोग माँ भगवती दुर्गा से इन दोनों मासों में विशेष प्रार्थना करते है कि बोए हुए फसल में अधिक से अधिक उपज हो जिससे परिवार व कुटुम्ब की भरण पोषण पूरे सालभर कर सकूँ ।
यदि दोनों नवरात्रों को स्वास्थ्य की दृष्टि से विवेचन किया जाए तो शास्त्रों में शरीर को स्वस्थ्य रखने के लिए नौ दिनों तक विशेष व्रत का विधान किया गया है । क्योंकि व्रत के दिनों में भगवती की पूजा-अर्चना हेतु पत्र-पुष्प,फल,नैवेद्य इत्यादि का विधान किया जाता है । अतएव अन्य दिनों के अपेक्षा इन दिनों में लोग प्रातः भ्रमण पर शीघ्र जाते है वहाँ से पत्र-पुष्प चुन के लाते है । धार्मिक अनुष्ठान हेतु सम्पूर्ण नवरात्रों के दिनों में प्रातः भ्रमण करते हुए प्राणप्रद वायु का लोग सेवन करते है जो मानव के स्वास्थ्य हेतु अमृत का काम करता है । इस प्रकार फल-फूल पत्तों के संकलन के बहाने यह भ्रमण शारीरिक स्वास्थ्य हेतु रमणीय है । इस प्रकार निरन्तर भ्रमण करने से फिर स्वतः प्रातः शीघ्र उठने का एक क्रम बन जाता है जो मनुष्य के जीवन की अनेक क्रियाओं में लाभकारी सिद्ध होता है । जैसे एक गर्भस्थ शिशु अपनी माँ के गर्भ में नौ महीने तक समय व्यतीत करता है,उसीप्रकार एक साधक भक्त भी इन नौ दिनों और रातों में व्रत,प्रार्थना,मौन एवं ध्यान के द्वारा अपने सच्चे स्तोत्र की ओर वापस आता है । वस्तुतः नवरात्रि तीनों स्तरों पर राहत ही प्रदान करती है – स्थूल,सूक्ष्म एवं कारण । व्रत जहाँ मानव शरीर को पवित्र करता है,जबकि मौन वाणी को पवित्र करते हुए अशान्त मन को शान्त करता है तथा ध्यान साधक को अपने लक्ष्य की ओर ले जाता है । साथ ही नवरात्र के दिनों में प्रत्येक लोगों के घर में सात्विक आहार का सेवन किया जाता है । शास्त्र में भी कहा गया है ‘आहारशुद्धौ सत्वशुद्धौ….’ अर्थात् खान-पान शुद्ध सात्विक से मानव को तन-मन दोनों से स्वस्थ होकर भक्ति भाव के साथ पूजा-अर्चना करने में मन लगता है जिससे जीवन सुखमय व आनन्दित होता है ।

newsofbihar.com की ख़बरें अपने न्यूज़फीड में पढ़ने के लिए पेज like करें

loading...

अपने विचार साझा करें

आवश्यक लिखें चिह्नित:*

Powered By Indic IME