23 अगस्त, 2017
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मिथिला में लगता था विश्व का पहला मेट्रिमोनियल सभा !

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मधुबनी, 6 जुलाई। भागम-भाग भड़ी इस दौड़ में लोग बेटा-बेटी की शादी को लेकर काफी चिंतित रहते हैं। यही कारण है कि लोग मैट्रिमोनियल साइटों पर अपना अपना प्रोफाइल अपलोड कर योग्य वर और कन्या तलाश रहे है। वैसे आपको जानकर आश्चर्य होगा कि विश्व का पहला मैट्रिमोनियल सभा यूँ कहे तो पहला ऑफलाइन मैट्रिमोनियल सभा बिहार में एक राजा के पहल पर लगाया गया था जो की काफी प्रसिद्ध हुआ था और वर्तमान के लिए अभी तक स्वर्णिम इतिहास बना हुआ है।

हम बात कर रहे हैं बिहार के मधुबनी जिला स्थित सौराठा सभा की, जहां कभी दुल्हों का मेला लगता था। लाखों लोग इस मेला में भाग लेने आते थे, दुल्हा मिथिला की पारंपरिक परिधान धोती, कुर्ता, दोपट्टा, पाग और आंख में काजल लगाए सज सवर कर बैठा करते थे। इस सभा के इतिहास के बारे में कहा जाता है कि राजा हरिसंह देव ने लगभग 700 साल पहले 1310 ईसवी में यह प्रथा शुरू की थी। ताकि विवाह बंधन करने में लोगों को परेशानियों का सामना न करना पड़े।
जानकार बताते हैं कि इस सभा का आयोजन सौराठ के अतिरिक्त सीतामढ़ी के ससौला, झंझारपुर के परतापुर, दरभंगा के सझुआर, सहरसा के महिषी और पूर्णिया कें सिंहासन सहित अन्य स्थानों पर भी इस मेला का आयोजन किया जाता था, जिसका मुख्य कार्यालय सौराठ हुआ करता था। वैसे अब आधुनिकता के इस दौर में इस ऐतिहासिक मेला प्रथा का आयोजन मात्र सौराठ में किया जाता है।

वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित है यह सभा
सौराठ सभा के बारे में कहा जाता है कि यह राजा हरिसिंह देव की पहल पर आयोजित सभा पूर्ण रूप से वैज्ञानिक पद्धति पर केंद्रित है। जो बात विज्ञान आज कह रहा है उसे राजा हरिसिंह देव ने लागू करवाने का काम किया था। वरिष्ठ चिकित्सकों के अनुसार एक ब्ल्ड ग्रुप वालों के बीच वैवाहिक संबंध होने से कई परेशानियों का सामना करना होता है।
सौराठ सभा मिथिला का सांस्कृतिक महोत्सव है । सौराठ सभा मे ब्याही गयी कन्या को वैधव्य का दुःख नही भोगना पड़ता है, ऐसी मान्यता रही है । बिना दौड़धूप एक स्थल पर योग्य वर चयन करने हेतु यह उत्तम व्यवस्था के रूप में प्रतिष्ठित था । पहले सरकारी स्तर पर भी कुछ सहयोग की जाती थी जो अभी पूर्णतः बन्द है । आंकड़े के अनुसार सातवें दशक तक करीब दस हजार शादियाँं सौराठ सभा मे तय होती थी । परन्तु आधुनिक सभ्यता के प्रभाव के कारण इसके विशिष्ट महत्व एवं रौनकता में कमी आई है । अभी आधुनिकता व व्यस्त जीवन मे इसे “दहेज मुक्त विवाह” हेतू अभियान स्वरूप समय सापेक्ष व्यवस्था एवं प्रक्रिया मे सुधार कर इसे “विवाह महासमारोह” के रूप में व्यवस्थित करने की आवश्यकता है। मिथिला के बौद्धिक एवं युवा साहस कर इसे पुनरुत्थान करें तो यह ऐतिहासिक विरासत के लिए ऐतिहासिक कदम साबित हो सकता है और बाकी संसार के लिए अनुकरणीय भी ।

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कैसे आरंभ हुआ सौराठ सभा का आयोजन
राजा हरिसिंह देव के दरबार मे नियमित रूप में शास्त्रार्थ हुआ करता था । जिसमें विजय प्राप्त करने वालों को पुरस्कृत किया जाता था। वर्ष 1326 ई. मे हरिसिंह देव ने अविवाहित मैथिल ब्राह्मण युवकों के बीच शास्त्रार्थ का आयोजन करवाया। वेद-वेदान्त, योग, सांख्य, न्याय आदि विषय पर बहुत दिन तक शास्त्रार्थ चलता रहा। हरिसिंह देव शास्त्रार्थ मे सहभागी विद्धान युवकों की विद्वता देख अत्यधिक प्रभावित हुए और चुँकि शास्त्रार्थ मे सहभागी सभी युवक अविवाहित थे इसलिए सभी को एक एक सुन्दर कन्या पुरस्कार स्वरूप प्रदान किया। इस घटना के पश्चात प्रत्येक वर्ष युवकों के बीच शास्त्रार्थ का आयोजन किया जाने लगा। शास्त्रार्थ मे कन्या पक्ष वाले योग्य वर का चुनाव करते थे। सभा मे वर पक्ष और कन्या पक्ष के बीच सम्पूर्ण बातचीत तय होने के पश्चात विवाह के लिए अनुमति सभा मे उपस्थित पंजीकार से लेना पड़ता था जो की यह विधि आज बी बरक़रार है। इस विधि के अनुसार पंजी मे दोनो पक्ष के बीच सात पुश्त तक कोई खून का सम्बन्ध नही ठहरने के पश्चात पंजीकार द्वारा विवाह के लिए अनुमति दी जाती है। इसके बाद वर और कन्या का जन्म कुंडली मिलाया जाता है । सब कुछ मिलने के पश्चात पंजीकार द्वारा सिद्धान्त प्रथा जारी किया जाता है । पंजीकार अपनी सहमति वरगद के एक सूखे पत्ते पर लिखकर देते हैं । पंजीकारों के पास पंजी मे देश विदेश मे बसे सम्पूर्ण मैथिल ब्राहम्ण परिवार की वंशावली होती है। इस मे पीढ़ी दर पीढ़ी कुल, मूल और गोत्र का विवरण मिलता है। पहले यह भोजपत्र पर लिखा जाता था फिर तामपत्र और अब कागज पर इसका सम्पूर्ण विवरण दर्ज किया जाता है।

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कैसे हुआ पंजी प्रथा का शुभारंभ
ब्राह्मणों के कुल 12 गोत्र होते है। पंजीकारों के पास 84 पंजियाँ होती है जिसमें हरेक पंजी में दो सौ गांवो का सम्पूर्ण विवरण उल्लेख किया गया मिलता है। ब्राहम्ण अपनी विद्वता, शिष्टता और समुचित सलाह देने में कुशल होने के कारण शासक के प्रिय होते थे। फलतः राजकीय सुख सुविधा भी प्राप्त करते थे। इसका फायदा उठाने हेतु गैर ब्राहम्ण भी किसी तरह छल कपट द्वारा ब्राहम्ण परिवार में विवाह कर लेते थे। इसी विकृति से बचने हेतु पंजी प्रथा का आरम्भ किया गया।
पंजी प्रथा के शुभारम्भ के विषय मे अत्यंत रोचक कथा ‘जनरल आव द बिहार एण्ड उड़ीसा रिसर्च सोसाइटी’ मे किया गया है। पंडित हरिनाथ मिश्र राजा हरिसिंह देव के दरबार में पंडित का काम करते थे। पंडित मिश्र की पत्नी असीम सुन्दरी थी। वह नित्य जंगल मे भगवान शिव की पूजा करने जाती थी। ब्राहम्णी के सौन्दर्य पर एक चाण्डाल की बुरी नजर थी फलतः लोगों में अपवाह फैला दी गई की वह चरित्रहीन है। इस के कारण उसे समाज से बहिष्कृत कर दिया गया। पंडित हरिनाथ मिश्र भी भ्रमित हो पत्नी पर शक करने लगे इस पर उनकी पत्नी दुःखी हो राज दरबार में चरित्रवान शाबित होने के लिए हर परीक्षा देने के लिए तैयार हुई। राजा के आदेश पर परीक्षा ली गई । “नाहम् चाण्डाल गामिनी” अर्थात यदि मैं चाण्डाल गामिनी हूँं तो मेरा हाथ जल जाय। इतना कहते ही उसके हाथ जल जाते हैं और इसके बाद सभा में चरित्रहीन कहकर घोषणा की गई। सती इस परीक्षा से संतुष्ट नहीं हुई और पुन: परीक्षा लेने हेतु राजा हरिसिंह देव से गुहार लगायी। इस बार मंत्र को संशोधन कर “नाहम स्वपति ग्यतिरिक्त चण्डाल गामिनी” कहकर आग पर हाथ को रखा, इस बार हाथ नहीं जला। इस घटना से सभी आश्चर्यचकित हो गए। राजा के आदेश पर विद्वान पण्डितों ने हरिनाथ मिश्र और उनकी पत्नी की कुंडली को मिलाया तो पता चला कि वो दोनो एक ही मूल गोत्र के हैं इसी कारण पण्डित मिश्र चाण्डाल हुए और यह विवाह अपवित्र है। उसी दिन से पंजी व्यवस्था का सूत्रपात किया गया ताकि सगोत्री यानी अपने ही गोत्र के लोगो का आपस में विवाह से बचा जा सके।

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जानकारी दें की इस ऐतिहासिक परम्परा को आज भी मिथिला के लोग संरक्षित करने में लगे हुए है। विगत वर्षों की भांति इस वर्ष भी मिथिला के प्रसिद्ध ऐतिहासिक सौराठ सभा का आयोजन जिले के सौराठ स्थित सभा गाछी में आगामी 8 जुलाई से 14 जुलाई तक किया जा रहा है।

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