जानिए… वाजपेयी ने मिथिला में भोज खाने के बाद जनेऊ लेने से क्यों कर दिया था इंकार

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न्यूज़ डेस्क : बिहार के मधुबनी जिला अंतर्गत बेनीपट्टी अनुमंडल के शिवनगर गांव में कभी दिवगंत भारत रत्न पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी मेहमान बनकर आये थे। साल 1982 का था और मौका था तत्कालीन बिहार भाजपा के उपाध्यक्ष स्व. ताराकांत झा के यहां आयोजित यज्ञोपवीत संस्कार का। दरअसल उन दिनों अटल बिहारी वाजपेयी बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हुआ करते थे। पार्टी का जनाधार तेज करने के लिए वह बिहार दौरे पर आए थे। उसी क्रम में सीतामढ़ी से लौटते हुए उन्होंने मधुबनी के शिवनगर गांव में करीब दो घण्टे का समय बिताया था। वाजपेयी के निधन की खबरे सुनकर शिवनगर गांव के लोगों की आंखें नम हो गई। वाजपेयी के शिवनगर गांव आने पर स्वागत करने वाले बुजुर्गो की आंखें उनकी मृत्यु की खबर पाकर अश्रुधारा से भर गई।

शिवनगर गांव में अटल बिहारी वाजपेयी के आगमन को याद करते हुए गांव की निर्मला देवी रो पड़ी। निर्मला देवी ने बताया कि उनके स्वागत में लिए गांव में भव्य द्वार बनाया गया था। जब वह गांव की सीमा में आये तो उन्हें आस-पास के कई गांवों के फूल से बनें विशाल माला से स्वागत किया गया था। भव्य माला को देखकर वाजपेयी बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा कि यह तो बहुत सुंदर है। इस पल को याद करते अटल बिहारी वाजपेयी के लिए माला बनाने वाली निर्मला देवी रो पड़ी।

आगे उस दिन को याद करते हुए अधिवक्ता पंडित स्व ताराकांत झा के छोटे भाई डॉ अयोध्यानाथ झा बताते हैं कि मिथिलांचल की संस्कृति के अनुसार उन्होंने लकड़ी की बनी पीढ़ी के साथ जमीन पर बैठकर भोजन किया। खाने में उन्हें मिथिला का प्रसिद्ध स्वादिष्ट व्यंजन तिलकोर का तरूआ,ओल की चटनी, खमहाउर का तरूआ और सकरौरी काफी पसन्द आया था। जिसकी उन्होनें काफी सराहना की था। इसी क्रम में स्थानीय लोगों ने मैथिली भाषा को अष्टम अनुसूची में शामिल करवाने के लिए उनसे आवेदन निवेदन किये। जिस पर कुछ देर मंथन करते हुए हिन्दी साहित्य प्रेमी वाजपेयी ने कहा था कि हिन्दी भाषा को मिथिलांचल में नुकसान न हो तो इस शर्त पर मैथिली भाषा को अष्टम अनुसूची में शामिल करवाने का पहल किया जाएगा। यूं कहें तो पहली बार यहीं से उन्होंने मैथिली भाषा को अष्टम अनुसूची में शामिल करवाने की प्रतिबद्धता को जाहिर किया था।

आगे अटल जी का अतिथि आतिथ्य हुआ, भोजन हुआ वहां से उठकर वह सामान्य लकड़ी से बनी चौकी पर एक घंटे तक विश्राम किए। स्व. पंडित ताराकांत झा के छोटे भाई डा. अयोध्यानाथ झा कहते हैं कि आज भी वह चौकी सुरक्षित है जिस पर अटल जी ने विश्राम किया था। आगे उन्होंने बताया कि दिवगंत अटल बिहारी वाजपेयी के सम्मान में शिवनगर के ग्रामीणों ने गांव में 19 अगस्त को श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया है जिसमें उनसे जुड़ी यादों के रूप में उस चौकी को उपयोग में लाया जाएगा।

भोज व विश्राम के बाद जब अटल अपने अगले गंतव्य के लिए रवाना हो रहे थे तो पंडित ताराकांत झा के पिताजी ने अटल बिहारी वाजपेयी को पाग, दोपटा, अंग वस्त्र, पान, जनेऊ, सुपारी आदि के साथ विदाई दी। लेकिन वाजपेयी ने जनेऊ लेने से यह कहते बुरे इंकार कर दिया कि मैं‌ सिर्फ ब्राह्मण नहीं हिन्दू हूं। फिर उन्हें हिन्दू संवर्धक के नाते जनेऊ लेने के लिए आग्रह किया गया और फिर वह उसे ग्रहण कर खुश होकर विदा हुए। आगे जब उनके जाने का समय होने लगा तो पंडित ताराकांत झा के अयोध्या पिताजी ने वाजपेयी से मिथिला के सत्कार को लेकर कुछ वाक्य मैथिली में कहने का आग्रह किया। जिस पर वाजपेयी जी ने मुस्कुराते हुए मैथिली में कहा- आएल जाउ, पांव पखारल जाउ, बैसाल जाऊ, पाएल जाउ बेस जाएल जाउ। अटल बिहारी वाजपेयी के मुंह से मैथिली में यह वाक्यों को सुनते ही वाजपेयी के आतिथ्य में लगे लोग व स्वंय अटल बिहारी वाजपेयी ठहाके मारकर हंसने लगे थे।

शिवनगर गांव के ग्रामीण इंजीनियर विनोद शंकर झा लड्डू बताते हैं कि हम लोग आज भी अटल जी के शिवनगर आगमन पर गौरवान्वित महसूस करते हैं। ऐसे महान व्यक्तित्व का इस छोटे से गांव में आना हमारे लिए सौभाग्य था। उनकी मृत्यु से पूरा गांव मर्माहत है।

©बिदेश्वर नाथ